बाबरपुर (अयोध्या) की तारीख़ी मस्जिद को शहीद कर के भीख (चैरिटी) में दी गई ज़मीन पर अब एक और नई मस्जिद का काम शुरू होने जा रहा है। अब सवाल बड़ा यही है, क्या शिद्दत पसंद हिन्दू कभी इस बात को तस्लीम करेंगें की उनके वतन और हिन्दू राष्ट्र में एक आलीशान मस्जिद की ज़मीन किसी हिन्दू राजा (मोदी) ने वक़्फ़ की हो या भीख में मुस्लिम अवाम को दी हो। अगर हाँ, सब कुछ तस्लीम ही करना है, तो बाबरी में क्या ख़राबी है। वोह भी तो हिन्दुस्तान की ज़मीन पर ही बनी हुई थी। उसको क्यों शहीद किया गया।
इस बात की ज़ामिन कौन लेगा की आने वाले १००० सालों के बाद इस मस्जिद पर भी कोई तनज़िया नहीं होगा और इस मस्जिद को साजिश के तहत सीता की पैदाइश गाह नहीं बताया जाएगा। और जिस अंदाज़ में बाबरपुर में बाबरी के अंदर रात की तारीकी में डाका डाल कर राम की मूर्ती नसब की गई थी और कई सालों तक मस्जिद को क़ैद रखा वही अब मोदी मस्जिद के साथ नहीं होगा। और उसके अंदर सीता या लक्ष्मण की मूर्ती चोरों की तरह नसब नहीं की जाएगी। और उसको सीता की पैदाइश गाह है बोल कर तनज़िया नहीं खड़ा किया जाएगा।
नाज़रीन यह तो सोच का असर होता है जहाँ इंसान के दिल पाक हों, जहाँ इंसान गुनाह करने से पहले १००० बार सोचे की हमें कोई देखे या ना देखे हमको अपने मालिके कायनात को जवाब देना है तो गुनाह हो ही ना। फिर ऐसे में अगर किसी की लाखो करोड़ों की कोई अश्यात आपके पास आई तो आपका ईमान कभी उसके ऊपर बदगुमान नहीं होगा क्योंकि आप को इस बात पर कामिल यक़ीन होगा की यह चीज़ हमारी नहीं है और इसका हक़ीक़ी मालिक कोई और है हम कैसे किसी दुसरे के चीज़ पर डाका डाल सकतें हैं।
ख़ैर जिस अंदाज़ में मोदी मस्जिद के आलीशान नक़्शे का डिजाइन जारी किया है, तो उसके ऊपर हिन्दू शिद्दत पसंद और दहशतगर्दों के दिलों पर सांप तो लौटेंगे और हर हाल में उस जगह को वोह मुस्तक़बिल में लूटना चाहेगें।
दूसरी सबसे मज़बूत वजह इस मस्जिद को भी मुतनज़िया बनाने की जो इस सहफ़ी को समझ मे आती है वोह है, इस मस्जिद में कोई गुंबद नहीं होगा। और हिन्दू शिद्दत पसंद यही वजह बतायेगे की इसमें कोई गुम्बज नहीं है वोह मस्जिद है ही नहीं। वोह तो सीता की पैदाइश गाह है। तीसरी वजह पांच एकड़ में बनने जा रही इस मस्जिद में, अजायब घर (म्युसियम), कुतुबखाना (लाइब्रेरी) और बरादरी का बॉवर्चीख़ाना होगा। मस्जिद के हुदूत में ३०० बेड की सलाहियत वाला एक अस्पताल भी होगा. जो हर खासों आम के लिए होगा ना की किसी मख़सूस बरादरी के लिए वक़्फ़। चौथी वजह बतायेगे की मस्जिद हर खासों आम की ज़रुरत वाली जगह बनी है तो लाइब्रेरी, हॉस्पिटल, अजायबघर में आने वाले हिन्दू अफ़राद को अज़ान और दौरान नमाज़ दुश्वारियों का सामना करना होता है तो इस मस्जिद को मन्सूख़ किया जाए।
पांचवी वजह धन्नीपुर के १३०० आबादी वाले गांव की हिन्दू अक्सरियत जो फील वक़्त ५० फीसद के क़रीब है, बाक़िया ५० फीसद में दिगर अवाम हैं। मुस्तक़बिल में हिन्दू अक्सरियत के क्या हालात होंगे, कोई नहीं बोल सकता। गांव के सरबराह राकेश यादव ने कि बताया की गांव में इतनी बड़ी आलीशान मस्जिद को लेकर अवाम जोशफीन हैं.
यादव बताते हैं कि गांव में इस मस्जिद को ले कर अमन है और अवाम ने किसी भी किस्म की फ़िरक़ावाराना कशीदगी अभी तो नहीं है। उन्होंने मज़ीद कहा मस्जिद की हुदूत में अस्पताल बनाने के फैसले से मुक़ामी अवाम को काफी मदद मिलेगी. उन्होंने कहा कि गांव में नई मस्जिद के साथ इलाक़े के सभी नौजवानों लिए रोज़गार और मशीयत के नए बाब खुलेगें और तरक़्क़ी के नए इमकानात पैदा होंगे।
धन्नीपुर गांव के बड़े तबके के हिन्दू मज़हबी रहनुमा पंडित मदन
लाल के भी कुछ ऐसे ही तास्सुरात हैं, उनका कहना है कि गांव हमेशा से अमन में रहा है और मज़हबी रिवायतों
पर कभी कोई तनज़िया नहीं हुआ. लेकिन अक्सरियत वाले हलके में मस्जिद के आने और तामीर
से गांव के अवाम पशो पेश में हैं, अलबत्ता मस्जिद के डिजाइन को देखकर और तरक़्क़ीयाती कामों को जानकर
खुश हैं और मस्जिद की तामीर का इंतजार कर रहे हैं.
सहाफी जुबेर की राय
नाज़रीन जिन मुस्लिम अवाम को भारत में दुसरे और तीसरे दर्जे के शहरी बनाने के लिए हुकूमत, संघ, शिद्दत पसंद और अदलिया बेकरार हैं, वही मुस्लिम अवाम अपनी इबादत गाह में भी अवाम के फलाही कामों को फरामोश नहीं कर रहा है। मोदी मस्जिद में होगा, हॉस्पिटल, लाइब्रेरी, म्यूज़ियम, और बरादरी का बावर्चीख़ाना। अब इस तमाम चीज़ों से सिर्फ मुस्लिम तो फायदा नहीं उठाएंगे बरक़्स तमाम अवाम के लिए फलाही काम का एक इदारा खोल दिया। वहीँ बाबरी मस्जिद को शहीद कर के क्या बनाया जा रहा है, सिर्फ मंदिर राम का मंदिर जिसमे सिर्फ और सिर्फ दहशत और ख़ौफ़ की तरबियत दी जाएगी।
जिसके अंदर दाख़िल होते ही अवाम सिहर उठेगा, और उसको हर वक़्त इस बात का एहसास होता रहेगा की इस मंदिर की तामीर दुसरे मज़हब की इबादत गाह को तोड़ कर की गई है। इस मंदिर को तामीर करने से पेश्तर हज़ारों लाखों अफ़राद का ख़ून बहा है। जिसमे शामिल है १९९० की आडवाणी की रथ यात्रा से पैदा हुई कशीदगी और क़त्ले आम से ले कर तो मुल्ला मुलायम की राम भक्तों के ऊपर गोली बारी में कई को मौत की आगोश में भेजने की कवायत। जिसमे शामिल है २००२ में मोदी की पस्ती की जानिब जाती हुई सियासी तस्सव्वुर को साबरमती ट्रैन में राम भक्तों के ऊपर पेट्रोल डाल जला कर राख़ कर के उनकी लाशों पर अपना सियासी नफा लेने की क़वायत। जिसमे शामिल है १९९२ से ले कर तो तामीर होने तक अनगिनत मुस्लिम अवाम का ख़ून और फ़िरक़ापरस्ती का वोह बीज जिसको राम रथ के नाम से बोया गया और जो ज़हर उसके बाद तमाम भारत को निगल गया।
अयोध्या में तनज़िया की क्या वजह थी। मसला तो वही था की हमारी मुक़द्दस और अक्सरियत वाली जगह पर मस्जिद कैसे बनी। भलें ही अयोध्या का अवाम अमनपसद रहा हो और वोह किसी भी किस्म का तनज़िया नहीं चाहता था। लेकिन शिद्दत, जब्र और दहशत ने सब को ख़ामोश कर दिया। और हिन्दू दहशत के सामने बड़े बड़े मज़हबी रहनुमा (आला किरदार हिन्दू, मुस्लिम), अदलिया, सियासत, सहाफत सब खामोश रह गए। फिर वही तमाम अक्स और सूरते हाल बाबरपुर के धन्नीपुर गांव में बनने वाली मस्जिद के साथ हैं तो इस बात की क्या ग्यारंटी है की इस मस्जिद के साथ भी वोह सब कुछ नहीं होगा जो बाबरी के साथ हुआ।
नाज़रीन कुल मिला कर यह सहाफी यह नतीजा अखज़ कर रहा है की फील वक़्त मस्जिद की तामीर पर कोई एतेराज़ और तन्ज़िया नहीं है। लेकिन उसको कब मुतनाज़ा बना दिया जाएगा इसकी कोई ज़ामिन हद मुक़्क़र्र नहीं है। मस्जिद की तामीर और उसके बाद हॉस्पिटल और दिगर इदारों से होने वाली माशी तरक़्क़ी शिद्दत पसंद अफ़राद को नागवार गुज़रेगी, और वोह उस माश को हासिल करने की कोशिश करेंगे या नहीं तो उन इदारों में अपने हिन्दू नुमाइंदे या अपने मुवाफ़िक़ मुनाफ़िक़ों को बिठा देंगे। जैसा की आज अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का हाल महज़ ७ सालों में कर दिया है। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, अब अलीगढ़ मोदी यूनिवर्सिटी बन गई है। तमाम आला तरीन ओहदे मोदी भक्तों, बीजेपी और संघ के नुमाइंदों ने हड़प कर लिए हैं। बस अब तो मुस्लिम नाम ही बचा रह गया है। जो यूनिवर्सिटी में एक ग़ुलाम की हैसियत रखता है।
