अज़ीज़ नाज़रीन,
लखनऊ:
जिस Love jihad 'लव जिहाद' को मुद्दा बना कर नसरानी एजेंट और ग़ुलाम तमाम मुल्क में एक नफरत का माहौल पैदा कर के हैदराबाद, वेस्ट बंगाल, उत्तर प्रदेश इन्तेख़ाब को मुत्तासिर करने की साजिश और धोखेबाज़ी से जीतने की फ़िराक में थे, जिस मुद्दे पर तमाम मुल्क की फ़िज़ा को पुर आलूद करके गन्दा और गलीज़ करके दंगा फसाद मचाने और अकलियतों ख़ास मुस्लिम अवाम को ईज़ा पहुंचाने की ज़ाफ़रानी साजिश का पर्दा फाश हुआ है। इस मुद्दे पर मुल्क के तास्सुब और सख़्त तरीन फ़िरक़ा परस्त कुछ सूबे तो इस पर कानून भी बनाने का इरादा जता चुके थे।
लेकिन इस मसले पर सूबे उत्तर प्रदेश की हूकूमते ज़ाफ़रानी का नुमाया किरदार सामने आया है। योगी हुकूमत ने कानपुर में नाम निहाद 'लव जिहाद' मामले की जांच के लिए (सीट) को सौंप कर मसले की तहक़ीक़ात करने को कहा था। कानपुर और ख़ास सूबे उत्तर प्रदेश में एहले हुनूद में बढ़ती हुई इस्लाम से रग़बत, दिलचस्पी और हिन्दू बच्चिओं में मुस्लिम नौवजवानों से शादी कर के इस्लाम मज़हब इख़्तेयार करने के चलन से उन बच्चिओं के वाल्दैन खासे परेशान थे। सूबे उत्तर प्रदेश के कानपुर में १४ मामलों में लड़कियों के घर वालों ने पुलिस से शिकायत की थी कि उनकी लड़कियों को बहला-फुसला कर धोखे से मज़हब तब्दील करवा के शादी कर ली गई है. इस मुद्दे पर शिकायतों की का निबटारा करने के लिए जांच कर रही स्पेशल इनवेस्टीगेशन टीम (SIT) ने कहा है कि उसे साज़िश के तहत इज्तेमाई या मजमूई तरीक़ेकार हिकमत से मज़हब तब्दील करके शादी का कोई सुबूत नहीं मिला है और न ही इसमें किसी भी तरह की बेरुन मुल्क इमदाद या फंडिंग पाई गई है.
स्पेशल इनवेस्टीगेशन टीम यानी SIT का कहना है.
१. तीन
मामलों में बालिग़ लड़कियों ने अपनी मर्ज़ी से मज़हब बदलकर शादी की है, इनमें कोई अमल दरपेश नहीं हुआ।
२. तीन
मामलों में लड़कों ने ग़लत नाम बताकर शादी की है. फतेह खान ने आर्यन मल्होत्रा,
ओवैस ने बाबू और मुख्तार अहमद ने राहुल सिंह नाम रख लिया था.
३. कुछ मामलों में लड़कियां नाबालिग़ थीं, इसलिए लड़कों पर
ज़िना का केस दर्ज हुआ.
४. एसआईटी का कहना है कि यह बात सही
है की इन मामलों में नाम बदलने, मज़हब बदलने में तयशुदा कानूनी
तरीका नहीं अपनाया गया है. लेकिन उसमे साजिश
कही भी दिखाई नहीं देती है, हाँ अलबत्ता जोड़ा कम इल्मी और क़ानूनी दाव पेंच को नहीं जान्ने की वजह से गिरफ्त
में आया।
बरहाल इन नसरानी गुलामों ज़ाफ़रानिओं को जूते खाने की आदत पड़ गई
है। बग़ैर मुस्लिम अवाम के हाथों जूते खाने
के इनका खाना हज़म नहीं होता है। यह लातों
के भूत हैं बातों से नहीं मानते, एक मसला हल हुआ दूसरा शुरू। आज दरिंदा, कसाई, ज़ालिम, दहशतगर्द, जल्लाद हैदराबाद इन्तेख़ाब
में ज़ाफ़रानी तंज़ीम की कड़ी पतली होते देख कर इलज़ाम लगाता है की हैदराबाद में ३०,००० रोहंगिया को ग़ैर क़ानूनी हिकमत इख़्तेयार कर के वोटर लिस्ट
में शामिल किया गया है।
अब किसी दरिंदे कसाई सर क़लम करने वाला जल्लाद की बात सुन कर मजलिस के सरबराह असदुद्दीन कहाँ खामोश रहने वाले थे उन्होंने फ़ौरन इलज़ाम लगाने वाले रावण दरिंदे से पुछा अगर ३०,००० रोहंगिया ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से हैदराबाद में बरसों से रह रहे थे तो तुम क्या कर रहे थे, तुम्हारा वाज़ारतख़ाना क्या कर रहा था। अगर तुम जैसे वज़ीरे दाख़ला के होते हुए भी दरन्दाज़ी हो रही है तो नाहेली तुम्हारी साबित होती है। तुम नाहेल और निकम्मे वज़ीरे दाख़ला साबित हो रहे हो। आगे मज़ीद उन्होंने कल शाम तक की चूनौती दरिंदे और जल्लाद को दे डाली उन्होंने कहा की ३०००० नहीं १००० भी रोहंगिया वोटर लिस्ट में साबित कर के दिखा दो।
फिर अगर यह तमाम शिद्दत पसंद, संघी दहशतगर्द हर एक बीजेपी वाला सब मिल कर कल शाम तक १००० रोहंगिया का धोखे से वोटर लिस्ट में नाम दाखिल किया इस बात का सबूत नहीं दे सके तो तमाम बीजेपी वाले हर एक, संघी दहशतगर्द हर एक, शिद्दत पसंद काफिर हर एक ज़न्खा साबित होगा उनमे मर्दानगी है ही नहीं बस हिजड़ों की तरह ताली बजाना और घोगरी आवाज़ में भोंकना जानतें हैं। हाँ इन हिजड़ों में ज़ाफ़रानी लंगूर और लँगूरनियाँ भी आ जाएगी। अब सबूत दो और अपने आपको मर्द साबित करो।
सहाफी जुबेर का मुस्लिम अवाम को पैग़ाम
नाज़रीन जिस हिसाब से हर हल्क़े में यह ज़ाफ़रानी रूसवा और ज़लील हो रहें हैं जिसके लिए वोह मुस्लिम अवाम को तकलीफ देने के क़ानून बना रहे थे, तो यह सहाफी हर मुसलमान से कहना चाहता है की अल्लाह की डोरी को मज़बूती से पकड़ लो फिर तुमको वक़त का फ़िरोन तो क्या उससे भी ज़्यादा ज़ालिम तरीन फ़िरोन भी आ जाएगा तो ज़र्रा बराबर ईज़ा और तकलीफ नहीं पंहुचा सकता है।
हर काम को करने के पीछे अपने मज़हब को आगे रखो, किसी के साथ साजिश और धोखे बाज़ी ना करो, धोखा देना साजिश करना गुनाहे अज़ीम है। सच्चाई, ईमानदारी का मुज़ाहेरा करो, अगरचे किसी हिन्दू खातून से प्यार हो भी जाता है तो उसको इस्लाम मज़हब इख़्तेयार करने को कहो और तमाम क़ानूनी मरहले के साथ उसको मज़हबे इस्लाम में ले कर आओ फिर उससे निकाह करो। फिर जब वोह ग़ैर मज़हबी खातून इस्लाम क़ुबूल कर के तुम्हारे निकाह में गई तो उसके साथ हुस्ने सुलूक करो उसके ऊपर दस्ते शफ़क़्क़त रखो। उसका अजर एक इस्लामी लड़की से दो गुना ज़्यादा है। पहला वोह तुम्हारे इश्क़ में अपने वाल्देन को छोड़ के आई दूसरा अपना मज़हब जो इंसान को सबसे ज़्यादा अज़ीज़ होता है उसको भी छोड़ दिया।
जब तुम अल्लाह के बनाये हुए क़ानून को नहीं तोड़ोगे तो अल्लाह दुनिया के क़ानून तुम्हारे लिए तब्दील कर देगा और यह महज़ ज़ुबानी जमा खर्च नहीं है बल्कि इस सहाफी का तजुर्बा है। वतन की मोहब्बत का कही से कही तक कोई भी फलसफा क़ुरान और हदीस से साबित नहीं होता है। अलबत्ता सूरा अल इमरान में ४थे पारे में अल्लाह ने ईमान वालों से कहा है की इस्लामिक रियासत की सरहदों की हिफाज़त करो। अगर कोई भी मुनाफ़िक़ वतन की मोहब्बत के नाम पर तुमको बहलाता है फुसलाता है तो उसको सही और माक़ूल जवाब देने के लिए तुमको चाहिए की मज़हबे इस्लाम की तमाम जानकारी हासिल हो।
माफ़ करना बेशक अच्छी बात है और इस सहाफी ने इसके साथ इसके एहले ख़ाना के साथ जो भी ज़ियात्ती हुई सबको माफ़ करता गया, और उसका बदला अल्लाह लेता गया। मेरे सख़्त मज़मूनों की वजह से मेरे बड़े फ़रज़न्द को कान्वेंट स्कूल में बे इन्तहा अज़ीयत दी गई। जब वोह ८ साल का था तो पी.टी. टीचर पवार ने उसको उस हद तक मारा की उसको बुख़ार आ गया और उल्टियां होने लगी। पूरे बदन को पीट पीट कर ऊदा नीला कर दिया था, जब में ऑफिस से घर पंहुचा तो खून खोल गया लेकिन जब बात बड़ी और उस टीचर ने माफ़ी मांगी तो मेने और मेरी अहलिया ने माफ़ किया। बाद में पुलिस अफसर ने बताया की हमने उस पीटी टीचर की तहक़ीक़ात निकाली तो पता पड़ा, उसने आपके मज़मून से ख़फ़ा हो कर किसी सियासतदां के भड़काने पर बच्चे को बे ज़र्ब मारा था उस वक़्त महाराष्ट्र में कांग्रेस एन सी पी की हुकूमत थी।
लेकिन जब बात मज़हबे इस्लाम पर आ जाए क़ुरान, रसूले अरबी पर आ जाए अज़वाजे रसूल पर आ जाए सहाबा ऐ किराम पर आ जाए तो अब कोई माफ़ी नहीं होना चाहिए। क्योंकि इन सब लोगों के पर्दा करने के बाद यह काफिर इनके साथ बदकलामी कर रहें हैं। वैसे भी हयात ज़ईफ़ को क़ानूनी तहफ़्फ़ुज़ फ़राहम होती है और जाईफ को ईज़ा पहुंचाने वाले को सज़ा होती है, फिर यह बाइज़्ज़त शख़्सियत तो पर्दा कर चुके हैं और इस्लाम में एक मरे हुए आम मुस्लिम के खिलाफ बदकलामी बदगुमानी करना गलत है, फिर यह तो अल्लाह के बारगोज़ेदा बन्दे हैं। इनके खिलाफ की गई बदकलामी बदगुमानी कैसे बर्दाश्त होगी।