Wednesday, 27 May 2020

मंदिर खुलेंगे, 'मस्जिद, नहीं.

अज़ीज़ नाज़रीन आपसे गुज़ारिश की जाती है, ख़बरनामे के बाद आज के हालाते हाजरा पर सहाफी का मौलानाओं की जमात पर सख़्त मज़्ज़म्मती नज़रिया ज़रूर पढ़िए. 

बेंगलुरु मई २७, २०२०

बीजेपी की ज़ाफ़रानी हूकूमते कर्नाटक ने एक अज़ीम और तारीख़ी फैसला लिया है। येदियुरप्पा सरकार ने एक जून से सूबे के तमाम मंदिरों के दरवाजे ज़ायरीनों के लिए खोलने को सब्ज़ परचम लहरा दिया है। इस बीच हुकूमत का यह हूकूम तनाज़ियात में घिर गया है। कर्नाटक कांग्रेस के एक राकुनै असेंबली सवाल तलब किया है कि सिर्फ मंदिरों को क्यों खोला जा रहा है।

बेंगलुरु के शांतिनगर इलाक़े के कांग्रेस एम.एल.ए. एन.ए. हैरिस ने इलज़ाम तराशी की है कि हूकूमते कर्नाटक फ़िरक़ावारना सियासत  कर रही है।  रकून ने तमाम मज़ाहिबों के इबादत गाहा खोले जाने का मुतालबा किया है। एम.एल.ए. एन.ए. हैरिस ने कहा कि चर्च और मस्जिदों को भी खोला जाना चाहिए। कांग्रेस विधायक ने येदियुरप्पा हुकूमत पर मज़हब के तहत सियासत करने का भी इलज़ाम लगाया।

कोरोना इन्फेक्शन की वजह से २५ मार्च से मुल्के हिन्द के तमाम इबादतगाहों को बंद रखने का हूकूम दिया गया था। कोरोना वबा के मद्दे नज़र मंदिरों के बाब दो माह से बंद है। कर्नाटक हुकूमत ने बड़ा फैसला लेते हुए मंदिरों के बाब अवाम के लिए खोलने के फरमान जारी कर १ जून २०२० से कर्नाटक के तमाम मंदिरों को खोलने का हूकूम दिया गया है।
कर्नाटक के वज़ीर के. श्रीनिवास पुजारी ने बरोज़ मंगल को एलान किया की सूबे के तमाम मंदिर एकम जून से अवाम के लिए खोल दिये जाएंगे जो कोरोना वायरस के मद्देनजर जारी कर्दा लॉकडाउन के चलते दो माह से ज़ाइद वक़्फ़े से ज़ायरीनों के लिए बंद हैं। राज्य के वज़ीर कोटा श्रीनिवास पुजारी ने इत्तेला देते हुए कहा कि कर्नाटक हुकूमत ने १ जून से मंदिर खोलने का फैसला किया है। इसे लेकर ज़ायरीनों के लिए जल्द ही हिदायात जारी की जाएंगी। अवाम को एस.ओ.पी. की तामील करनी होगी।  हालांके वज़ीर यह बताने से क़ासिर रहे की हूकूम अदूली करने वालों या हूकूम की खिलाफवर्जी करने वालों के ऊपर क्या इक़दाम लिए जायेगें।
आज से कर्नाटक के ५२ मंदिरों में ऑनलाइन ख़िदमत की बुकिंग शुरू हो जाएगी। वहीं, ३१ मई तक मंदिरों को खोलने को लेकर सभी तैयारियां कर ली जाएंगी। जल्द ही हुकूमत की जानिब से मंदिरों के लिए भी हिदायात जारी की जाएंगी, जिसकी तामील सभी को करनी होगी। दरअसल मंदिरों के पुजारी और ज़ायरीन दोनों मंदिर खोलने का मुतालबा कर रहे थे, जिसके बाद हुकूमत ने ये फैसला लिया।

वज़ीर ने यह वाज़े किया कि मंदिर इबादत और रोज़ाना की रसूमात के लिए खुलेंगे। इसके अलावा मंदिरों में इज्तिमाई मंज़र (मेला) और दीगर हूजूमी मस्लेहत की इजाज़त नहीं दी जाएगी। हालांके वज़ीर गुजिश्ता माह लोक डाऊन के चलते कलबुर्गी जैसे वाक़ियात पर ख़ामोशी इख़्तेयार करने में ही अपनी और अपनी हुकूमत की भलाई समझे और कोई जवाब नहीं दिया।

सहाफी जुबेर का तबादला ख़्याल.

बिल्कुल वैसा ही हो रहा है जैसा की हमारी ज़ुबान से अलफ़ाज़ निकल रहे हैंरमज़ान के पहले अशरे के या वे रोज़े को हमारे खानदान में से किसी ने कहा था दुआ है की अब जल्दी से मस्जिदें खुल जाएँ.  हमने मेसेज में जवाब दिया हरगिज़ नहीं मंदिरें खुल जाएगी लेकिन मस्जिदें नहीं खुलेगीफिर वही बात अलफ़ाज़ से अदा की और मोबाईल पर बोलते हुए हमारे खानदान के किसी शख्स से बोला हरगिज़ नहीं मंदिरें खुल जायेगी लेकिन मस्जिदें नहीं खुलेगीउसके बाद वही अलफ़ाज़  हमारी अहलिया से बोले.
हूकूमते कर्णाटक की हिकमते अमली अब आगे की जानिब बढ़ेगी और तमाम हिंदुस्तान में ऐसा ही होगामंदिर खुल जायेगे लेकिन मस्जिदें नहीं खुलेगी बात भी वाज़े है, और मेसेज में कही जा चुकी है की मस्जिदों से मुसलमानों को घसीट घसीट के पीट पीट कर बहार निकाला जाएगामस्जिदें ना खुलने की सिर्फ वजह इस सहाफी को समझमे आती हैं.

१.           जब २०१८ के रमज़ान शरीफ में ताक़ रातों में एहतेक़ाफ़ की नियत ले कर जब यह सहाफी २० वे रोज़े को असर के बाद मस्जिद पंहुचा और जो सलूक खारघर की मस्जिद के मुत्तवालियों ने इस सहाफी के साथ किया था उसका ज़िक्र इस सहाफी ने अपनी उर्दू नज़्म "مسجدیں مرثیہ خانے ہیں کی نمازی نہ رہے" में किया हैपुलिस बुलवा कर उस मस्जिद के मुतवल्ली ने गिरफ्तार करवाने की नियत से हमको मस्जिद से निकलवाया थाजो अज़ीयत और तकलीफ हमारे खुदा को राज़ी ना करने की हमको हुई थी अब वोह तकलीफ तमाम मुस्लिम अवाम को भोगनी पड़ेगी.
 
२.          वजह, जिस फोर्ट की मस्जिद में हम ज़ोहर, असर और कभी कभी मगरिब की नमाज़ अदा करते थे उस मस्जिद में तमाम सी..डी. और ना जाने कौन कौन से मुनाफ़िक़, शिद्दत पसंद काफिर (सांघी या दीगर) जमावड़ा करते रहते थेऔर हमको सख़्त तरीन अज़ीयत और तकलीफ देते थेकस्दन कर गाली गुफ़्तार करना, कस्दन जूते हमारे कपडे से छूना, या सर पर जूते रख देना. ऐसा करने के पीछे उनका मक़सद हमको इबादत से गाफिल करना होता था और हमारा अपने खुदा से खौफ खाने के बजाये इन जैसे मुनाफ़िक़ों से ख़ौफ़ज़दा हो जाना थाफिर मस्जिद के तमाम मुत्तवालियों और आला ओहदेदारों को इन सब बातों का  इल्म था, कई बार कुछ लोग (हो सकता है पुलिस सादा कपड़ों) में हमारे बारे में दरयाफ्त करते थेफिर हमको जाते हुए बोलते थे जा रहा है बुलाव इसकोफिर ऐसे अनासिरों पर मस्जिद की इंतेज़ामिया ने काहे को कारवाही नहीं कीऐसे अनासिरों का आना जाना हमने ही हमारी हिकमत के हिसाब से रोका.

३.           वजह, जो घटिया लोग बोलते थे और हदीस का मफूम समझाते थे यह उन लोगों को जवाब हैजो बोलते थे की माफ़ करिये सऊदी में नमाज़ पर पाबन्दी नहीं लगी है और ना ही कर्फ्यू हैंउनका वोह विडिओ आना ही था की दो दिनों के लिए सऊदी हुक्काम ने मस्जिदे नबवी और मस्जिदे हराम में पूरी तरह से कर्फ्यू नाफ़िज़ कर दियाजिसका ज़िक्र इस सहाफी ने अपने एक मज़मून हिन्दू शिद्दत पसंदों, दहशतगर्दों के पुराने ट्वीट्स पर अरबों का बवाल. में किया है.

अगर यह सहाफी बात को थोड़ा और आगे तक ले कर जाए तो हो सकता है गिरजा घर खुल जाये हो सकता है गुरूद्वार भी खुल जाये लेकिन मस्जिदों के फिल वक़्त खुलने के कोई आसार नज़र नहीं आते हैं. अब अगर मस्जिदें खुली या तो जंग को फतह करने के बाद ही खुलेगी या फिर जिस तरह से पंजाब में १९४७ में बंद हुई मस्जिदें आज २०२० या २०१९ में खोली गई थी वैसा ही होगा.   

उसकी वजह हैमौलानाओं की जमात ज़ाफ़रानी हुकूमत से बेहद मरूब और ख़ौफ़ज़दा हो चुकी हैहर अमल को करने से पहले हमारी हुकूमत हमारे वज़ीरे आज़म वग़ैरा वग़ैरादूसरी बात हुकूमत के बुलावे पर हर मौलाना अपनी इज़्ज़त अफ़ज़ाई समझता है.  ख़ारजी खालिद रशीद फिरंगी मेहली और मेहमूद की तरह बग़ैर तहक़ीक़ात किये हर उस प्रोग्राम में शरीक हो जाता है जिसमे की मुनाफ़िक़ रहे हैं या दहशतगर्द रहे हैं या मुस्लिम अवाम के इज्तेमाई क़ातिल रहे हैं.   एक बोलता है हमने निज़ामे मुस्तुफा और एहकामे शरीयत को ठुकरा दिया और हिन्दू क़ानून को अपनाया और हिंदुस्तान में रहेदूसरा मोदी को खुश करने के लिए दिया बाज़ बन गया और ना सिर्फ अपने चमचो के साथ दिए जलाये बल्कि ऐसे वीडियो और फोटो भी सोशल मिडिया पर शयर  किये.

फिर मौलानाओं की जमात बर्माफलस्तीन और दीगर मुस्लिम अवाम के लिए एहतेजाज करतें हैं लेकिन पाकिस्तान के खिलाफ जंग का आगाज़ करने की हिमायत करतें हैंमौलाना अज़हर मसूद, हाफिज सईद के के पुतले जलाते हैंपाकिस्तान पर फौजी हिकमत कर के तबाह कर दो ऐसे बयानात हुकूमत की गुलामी में और गुलाम ज़ाफ़रानी मीडिया को देतें हैंइनको कसाब से नफरत है उसको लोग क़ातिल और दहशतगर्द बोलतें हैं वहीँ, हिन्दू दहशतगर्द, मुसलमानों का इज्तेमाई क़ातिल कुलभूषण जादव की हिमायत में हूकूमते हिन्द से मुतालबा करतें हैं की पाकिस्तान के ऊपर फ़िज़ाई हमला कर के हमारे हिन्दुस्तानी भाई जादव को भारत सरकार छुड़वा लाये

१.        क्या इनको इस्लामिक हुकूमत / इस्लामिक ख़लीफ़ा के खिलाफ साजिश करने वाले की इस्लामिक सजा का इल्म नहीं है

२.     क्या इनको मुसलमानों का साजिश कर के इस्लामिक मुल्क में मजमूई खून बहाने वाले की सजा मामूल नहीं है. क्या इनको इस्लामिक मुल्क की सरहदों की हिफाज़त के लिए ईमान वालों को क़ुरान का क्या हुकुम हैं मालूम नहीं है. 
 
३.           क्या इनको इस्लामिक मुल्क को साजिश कर के तोड़ने वाले की सजा मालूम नहीं हैफिर भी लोग पाकिस्तान के ऊपर हमला करने का एक काफिर से मुतालबा करतें हैंफिर अगर हमला हुआ तो ख़ूंरेज़ी दोनों जानिब होगी.  फिर क्या जंग हुई तो मुसलमान जाहांबाक नहीं होंगे. 

पुलवामा हमला हूकूमते हिन्द की ग़फ़लत का नतीजा थी, हूकूमते हिन्द ने अपना सियासी नफ़ा बरक़रार रखने के लिए उसको मज़ीद पेचीदा बनाया और पकिस्तान के ऊपर इलज़ाम तराशी कर दी.  फिर क्या था तमाम मौलानाओं की जमात बग़ैर मसले की तहक़ीक़ात किये आ गए पाकिस्तान के खिलाफ जंग का आगाज़ करने के लिए हूकूमते हिन्द के साथ.  अब जिस मुल्क के मौलानाओं का ज़मीर इतना कमज़ोर हो जाए की वोह ख़ुदा का ख़ौफ़ खाने के बजाये एक काफिर, ज़ालिम, दरिंदा सिफ़त, मुसलमानों का क़ातिल, इंसानियत का दुश्मन, ना इन्साफ हाकिम की जी हूज़ूरी करने लगें, जो बर्मा, फलस्तीन बेरुन मुल्क मुसलमानों के तो हमदर्द हो लेकिन अपने खुद के वतन हिंदुस्तान में जो हालात मुस्लिम अवाम पर हो रहे हैं, उनसे हुकूमत के खिलाफ एहतेजाज नहीं होता तो ऐसे मुल्क में मस्जिदे खुले या बंद रहे क्या फ़र्क़ पड़ता है. 

अब मस्जिदे खुलवाने के लिए तुमको अपने खुदा की इजाज़त की ज़रुरत नहीं बल्कि एक काफिर ज़ालिम, दरिंदा सिफ़त, मुसलमानों का क़ातिल, इंसानियत का दुश्मन, ना इन्साफ हाकिम की इजाज़त की ज़रुरत होगी.  फिर अगर उसने ना कह दिया तो क्या करोगे.

अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...