उत्तर प्रदेश में इक़्तेदार ज़ाफ़रानी तंज़ीम बीजेपी के रकूने असेंबली की वजह से
तंज़ीम एक बार फिर शदीद ज़लालत का बाइस बनी है. भदोही में खातून पर जिन्सी दहशत (ज़िना
बिल जब्र) के मामले में बीजेपी के मेमराने असेम्ली रवींद्रनाथ त्रिपाठी के खिलाफ एफ.आई.आर.
दर्ज कराई गई है. सिर्फ असेंबली मेंबर ही नहीं बल्कि उनके भतीजों और फ़रज़न्दों पर भी
एफ.आई.आर. दर्ज की गई है.
इस मामले में मेंबर असेंबली और उनके अहले ख़ाना के ६ अफ़राद पर पुलिस ने मुख़्तलिफ़
दफ़ाओं में केस दर्ज कर लिया है. वाराणसी की रहने वाली ख़ातून ने इलज़ाम लगाया था कि २०१७
में असेंबली इन्तेख़ाबात के दौरान भदोही की एक होटल में उसके साथ जिन्सी जुर्म को अंजाम
दिया गया.
बेवा ख़ातून वाराणसी की रहने वाली है जो की मोदी और मर्कज़ में क़ाबिज़ तंज़ीम के
भारत के वज़ीरे अज़ाम का इन्तेख़ाबी हल्क़ा है.
जुर्म की जगह उत्तर प्रदेश सूबा जो ज़ाफ़रानी तंज़ीम के ज़ेरे क़यादत है. मुजरिम
हुकुमरान जामात बीजेपी का असेंबली मेंबर. वाराणसी
की रहने वाली बेवा ख़ातून ने कुछ दिनों पहले पुलिस अफसर से मिलकर शिकायत की थी कि २०१७
में असेम्ब्ली इंतेखाब के दौरान बीजेपी मेंबर
असेंबली रवींद्रनाथ त्रिपाठी के भतीजे संदीप त्रिपाठी ने उसको मुंबई से भदोही बुलाया
और भदोही के एक होटल में कई दिन तक उसको रखा. होटल में बीजेपी विधायक ने उसके साथ ज़िना
किया. उसके बाद विधायक के भतीजों और बेटों ने भी ज़िना किया.
ख़ातून
की शिकायत पर भदोही कोतवाली में तजिराते हिन्द की दफ़ा ३७६ D, ३१३, ५०४, ५०६ के तहत
मुकदमा दर्ज किया गया है. भदोही के पुलिस अधीक्षक रामबदन सिंह ने बताया कि विधायक समेत
दीगर अफ़राद पर मुकदमा दर्ज कर पुलिस मामले की तफ़्तीश में जुटी हुई है.
सहाफी
जुबेर का नुक़्ताये नज़र
ऐसा
एहसास होता है की ज़ाफ़रानी तंज़ीम के लिए दुशवारियाँ ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहीं
हैं. बरक्स वो ज़ाफ़रानी तंज़ीम के लिए बढ़ती ही
जा रहीं हैं. ज़ाफ़रानी तंज़ीम का ग़ुब्बारा उसके
मेमरान के आदतन जुर्म करने के सबब फूग गया है.
तंज़ीम के आला ओहदेदार ऐवाने पार्लिअमान, एम.अल.ऐ., वज़ीरों के बढ़ती हुई जुर्म
करने की आदत से तंज़ीम में मुजरिमों की फेहरसित दिन बा दिन बढ़ती जा रही है. अमूमन ये बीजेपी के गुंडे मस्तूरातों के खिलाफ ही
जुर्म में मुल्लावीस रहतें हैं. इनका स्लोगन
"बेटी बचाओ, बेटी पड़ाव कहाँ गया",
आसिफा और उन्नाव के ज़िना बिल जब्र के बाद मेने एक स्लोगन दिया था. "बेटी बचाओ, बेटी छुपाओ"
एक
आला ज़ात का हिन्दू पंडित और बेवा ख़ातून के साथ ज़िना जैसे संघीन जुर्म में मुलव्विस. में समझने से क़ासिर हूँ की कैसे एक आला तरीन ज़ात
वाला इंसान गुनाहे अज़ीम कर सकता है, जिसकी इजाज़त इनका खुद का मज़हब नहीं देता और जो
इनके मज़हबी एतेक़ाद को चोट पहुंचाता है. इन
पंडित जी को बेवा का मतलब मालूम होना चाहिए, और ये उसके साथ ज़िना कर रहे हैं. शर्म
आती है. अकेले पंडित जी ही नहीं बल्कि उनके
एहले ख़ाना भतीजे और फ़रज़न्द भी इस घिनोने काम में शामिल थे. अगर किसी को भी उस खातून से मोहब्बत थी तो किसी
ने शादी की तजवीज़ काहे को नहीं भेजी, और उसको एक मौक़ा दिया गया की वोह भी अपनी ज़िन्दगी
नए सीरे से शुरू कर सके, बा हैसियत एक बेवा के नहीं बल्कि सुहागन और ख़ुशक़िस्मतों की
तरह. बजाये एक बेवा के जज़बात के साथ खेलने के अगर इनमे से किसी ने भी उसके साथ शादी
की होती तो उसको कितनी दुवाएं मिलती. लेकिन
इन लोगों को तो एक मजबूर, कमज़ोर, ज़रूरतमंद औरत के जिस्म को नोचने की आदत है. इन लोगों को उसको खुशी फ़राहम करने और उसकी ज़िन्दगी
में फूल खिलाने मदद करने में ज़र्रा बराबर ख़्वाहिश नहीं थी. शर्म.
