Sunday, 26 January 2020

गन्दी बात नहीं करते इंसान, कौन हो तुम, साधु या शैतान.

आज के भारत में अल्लामा इक़बाल का शेर याद आ गया.  "गुफ़्तार के गाज़ी बन तो गए किरदार के गाज़ी बन ना सके". 
अज़ीज़ नाज़रीन.

आज का मज़मून सख़्त मज़्ज़मती और एहतेजाज से लबरेज़ है.  इस मज़मून में तमाम खुली सोच वाले साथिओं ख़ास सेक्युलर हिन्दू अवाम की हौसला अफ़ज़ाई करता हूँ जो किसी भी ऐसी ना ज़ेबा बात की ताईद नहीं कर रहें हैं जो एक साधू या आम बीजेपी, शिद्दत पसंद हिन्दू की ज़ुबानी ज़हर को फ़रोग़ देती है.  ख़ास मस्तूरातों की निस्बत से जो बद कलामी गुजिश्ता दिनों में की गई बीजेपी के आला ओहदेदारों और शिद्दत पसंदों की जानिब से उसकी जितने सख़्त अलफ़ाज़ में मज़्ज़मत की जाए वो कम है. 

शाहीन बाग़ के चीख़ बाज़ों में सिर्फ मुस्लिम ख़वातीन ही एहतेजाज का हिस्सा नहीं हैं, बरक्स उसमे तो यूनिवर्सिटी की हिन्दू बच्चियां भी शामिल हैं जिनको अपना मुस्तक़बिल सियाह नज़र आता है.  उस एहतेजाज में आला तरीन आला किरदार मारूफ मस्तूरात और सियासतदान अलका लाम्बा इंतेखाब से क़ब्ल तक धरने का एक एहम हिस्सा थी.  जो मोदी जैसे दहशतगर्द, दरिंदे को खुला पैग़ाम और चेलेंज देने के लिए नक़ाब में हाज़िर हुई, जिससे उसकी और उस जैसी सोच को ज़ोरदार तमाचा पड़े की कपड़ो और पहनावे से इंसान की पहचान नहीं कर सकते बल्कि इंसान का किरदार उसके अमल और साफ़ शफ़्फ़ाफ़ सोच से ज़ाहिर हो जाता है.
 
आज जिस हिसाब से शाहीन बाग़ के चीख़ बाज़ों को बदनाम करने की साजिशे रची जा रही है उसकी सिर्फ तीन वजह ये सहाफी समझ सका है:-

१.     उस  एहतेजाज में चीख़ बाज़ों की चीख़ों से मोदी इंतेज़ामिया ख़ौफ़ज़दा है उसको अपनी हार क़यादत और कुर्सी शदीद ख़तरे में दिख रही है.  एक नींद का नाटक कर के सोने वाले जोकर के जैसे उनकी चीख़े भले ही हिटलर अनसुना करे, लंगूर मीडिया की लँगूरनियाँ और लंगूर तव्वज्जो ना दे लेकिन आलमी बरादरी मुतावातिर चीख़ बाज़ों की हर चीख़, नज़्म, नारे और आवाज़ को सून रही है और आज़ाद सहाफी उनकी चीख़ों पर सख़्त फिक्रमंद हैं और तवज्जो दे रहे हैं.    

२.        उस एहतेजाज की क़यादत मस्तूरातों के हाथ में है.  उस हिसाब से मोदी योगी जैसे उन तमाम मर्दों को अपनी मर्दानगी ख़तरे में दिख रही है, जो महज़ मर्द बने रज़ाई में घरों में छूपे बैठे रहतें हैं और मस्तूरातों के ऊपर ज़ुल्म करतें हैं शिद्दत मचाते हैं मार पीट करतें हैं ताके उनका मर्द होने का गुमान अवाम में बना रहे.  शाहीन जैसे एहतेजाज और मस्तूरातों की जीत के बाद अवाम अब उन तमाम मर्दों को ज़न्खा तस्लीम करने पर मजबूर हो जाएगा, जो महज़ महिला सशक्तिकरण, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ की ज़ुबानी जमा खर्च करतें हैं. जो मस्तूरातों के अपने हक़ के लिए ट्रिपल तलाक़ और शाहीन एहतेजाज पर अलहदा राये रखतें हैं. असल में ऐसे ही गुफ़्तार, लफ़्फ़ाज़, मक्कार मस्तूरातों के क़ातिल, ज़ानी और दुश्मन होतें हैं.  तभी वो सभी झूट और फरेब फैला रहे हैं ताके खातूनों के इस एहतेजाज को किसी भी क़ीमत पर तर्क किया जाए ताके हमारा मर्द होने का फरेब अवाम में बना रहे. 

३.         तीसरी वजह मज़हब से जुड़ी है क्योंकि इन शिद्दत पसंद और बीजेपी वालों को ये गुमान हो गया है की चीख़ बाज़ों के इस एहतेजाज में सिर्फ मुस्लिम मस्तूरातें ही सरे फहरिस्त हैं और ये लोग तो होते ही गद्दार हैं जबकि ऐसा नहीं है इस एहतेजाज में अवाम का हर वो तपका शामिल हो रहा है जिसको की नाइंसाफी हक़तल्फ़ी से नफरत है और जो हक़गोई के परचम को बुलंद करना चाहता है. 

एहतेजाज करना हर अवाम का दस्तूरी फ़र्ज़ है और उनका जमुहरियाई हक़ है.  एक तरफ तो आप गुफ़्तार के गाज़ी बन के बैठे हो की किसी भी मुस्लिम की शहरियत नहीं जायेगी दूसरी जानिब आप एहतेजाज करते हुए मुस्लिम अवाम के ऊपर जब्र कर रहे हो ज़ुल्म कर रहे हो ऍफ़.आई आर. दर्ज कर के उनको गद्दारे वतन बोल रहे हो.  हुकूमत का अमल इस बात की तस्दीक़ कर रहा है की वो मुस्लिम अवाम को भारत का बाशिंदा नहीं तस्लीम करतें हैं और उनके तमाम हुक़ूक़ छीन लिए गए हैं सभी जमुहरियाई हुक़ूक़ से उनको महरूम कर दिया गया है और आप बोल रहे हो की किसी की शहरियत नहीं जायेगी. 
  
आज इहतजाजे शाहीन को ऐसा शख़्स भी बदनाम करने की हिकमत में शामिल है जो ना सिर्फ मज़हबी बल्कि सियासी आला तरीन शख़्सियत साधू और सूबे का एहम ओहदेदार है.  उसने गलीज़ सोच और ज़ेहनियत का मुज़ाहेरा कर अपने नामर्द होने का सबूत दिया है, क्योंकि अगर वो मर्द होता तो ज़ाफ़रानी चादर के अंदर अपनी बदकारिया, बदालमियाँ और गुनाहों को पोशीदा रखने की हिकमत इख़्तेयार नहीं करता.  उसकी ऐसे गुफ़्तारे लफ़्फ़ाज़ी और उसकी गलीज़ ज़ुबान से निकले हुए अलफ़ाज़ से अब ये सहाफी उसके नुत्फे पर शक और शुकूक की गुंजाइश रख रहा है.
सूबे का आला तरीन ओहदेदार उसके ऊपर कोई भी इंतेज़ामिया पोस्ट नहीं दूसरा आला तरीन मज़हबी रेहनुमा साधू उसके ऊपर कोई पोस्ट नहीं लेकिन खातूनों के लिए सोच एक दम अदना और पस्त दर्जे की ये ज़ाहिर करती है की इसने ज़ाफ़रानी चादर में अपने आपको छुपाया ही इसीलिए है की उसकी बदकारिया अवाम के सामने ज़ाहिर ना हो जाए.  दूसरी बात इस शख़्स से ये सहाफी पूछना चाहता है की तूने अपनी वालेदा से दरयाफ्त किया है की तू किस चोराहे और नुक्कड़ पर जाती रहती थी किस मंदिरों मंदिरों मारी फिरती थी और किस गलीज़ साधू के रूप में शैतान का नुत्फा तेरे अंदर दाखिल हुआ जो साधू के भेस में मुझ जैसा शैतान पैदा हुआ.

फिर जो फरेब और गुफ़्तार ये साधू कर रहा है की मर्द तो रज़ाई में सो रहे हैं और ख़ातूनों को चौराहे पर बिठा दिया तो इसको कहना चाहता हूँ की तुझ जैसे रावण और शैतानों से ख़ातूनों को मेहफ़ूज़ करने के लिए हर भाई और वालिद एहतेजाज में मौजूद है.  इन भाइयों में सिर्फ मुस्लिम नहीं बल्कि चंद्रशेखर आज़ाद जैसे वो भाई भी शामिल हैं जो अपनी बहनों की आन और इज़्ज़त के लिए मौजूद हैं, और तुम जैसे शैतानी सोच पर हमेशा नज़रे रख रहें हैं की कही से तुम्हारी बरादरी और नस्ल का कोई देसी कुत्ता बरियानी के लालच में ना आ पहुंचे और माहौल को ख़राब करे.   शाहीन बाग़ में हर एहतेजाजी हिन्दुस्तानी है और हर मर्द उनका मुहाफ़िज़ भाई,  उसमे हिन्दू मुस्लिम के चश्मे से तुम लोग देख रहे हो. 
मुल्क भर में जहाँ कही भी एहतेजाजे शाहीन हो रहें हैं उनको बदनाम करने के लिए लंगूर मिडिया के लंगूर और लँगूरनियों ने नुमाया किरदार अदा किया है.  ऐसा कहतें हैं नो सो चूहे खा कर, हज़ारों हराम कर के सूवर-सुव्वारिया हरिद्वार चली. 

शिद्दत पसंद, बीजेपी वाले और संघी दहशतगर्द एहतेजेज शाहीन के चीख़ बाज़ों की चीख़ को गलीज़ नाम दे कर पस्त करना चाहते हैं.  

ज़रा उनसे कोई पूछे की अंजना ॐ कश्यप, श्वेता सिंह, रूबिक़ा लियाक़त, चित्रा त्रिपाठि उन आला ओहदेदारों और बीजेपी के मुहाफिजों से कितना लेतीं हैं. उनके दलाल दीपक चौरसिया, रोहित सरदाना, सुधीर चौधरी, आमिश देवांगन, मानक गुप्ता, सुमीत अवस्थी की इन लंगूर्नियों के रात वाले शो मे ग्राहक लाने के लिए कितनी दलाली लेते हैं.
तमाम गुफ़्तार, संघी दहशतगर्द, शिद्दत पसंद बोल रहें हैं की हम को समझ नहीं आ रहा.  अमित बोल रहा है की समझाने की ज़रुरत है.  में उन तमाम गुफ़्तारे लफ़्फ़ाज़ों से बोलना चाहता हूँ, ठीक है हम ना समझ हैं बल्कि हम ही नहीं हर भारत का अवाम कम अक़्ल है तभी तो उन्होंने आप जैसे जाहिलों और एहमकों को इक़्तेदार दिया, हमको समझ में नहीं आ रहा है लेकिन जो आलमी मुमालिक और उनके आला शख़्सियत आपकी हिकमते अमली पर सवाल उठा रहे हैं, तो आप आलमी बरादरी को समझा दीजिये.  एक बार अक़वामे मुत्तहिदा या अमेरिका के एवान में मुबाहिसा कर लीजिये.  या नहीं तो इंग्लैंड जिसकी जमुहरियाई हिकमत के हम पैकर हैं उसके एवान में मुबाहिसा कर लीजिये अगर आप आलमी बरादरी को मुबाहसे में मुत्मइन कर देतें हैं तो हम जैसे जाहिल अपने आप मुत्मइन हो जायेगे.  फिर आपको लंगूर और लँगूरनिओं की शहरियत के किसी भी क़ानून पर हिमायत की भी ज़रुरत नहीं होगी.  

आप क्रोनोलॉजी समझ लीजिये पहले अब आपको आलमी बरादरी को समझाना हैं जहाँ आपकी इज़्ज़त और वक़ार के लाले पड़े हुए हैं फिर आप हिन्दुस्तान की बात कीजिये.  आप कुछ भी कर लो "का", एन.आर सी. और एन.पी.आर. आलामी मुद्दा बन कर रहेगा, और उसको आपकी शिद्दत पसंदी और हिटलरशाही बनाएगी. 



अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...