Saturday, 19 October 2019

ख़ूनमझार अवाम, ज़ख़्मी जमुहरियत का क़त्ल और ज़ाफ़रानी सियासी निज़ाम


सहाफी इस बात को समझने से क़ासिर है ज़ाफ़रानी तंज़ीम के साथ क्या ये मेहज़ इत्तिफ़ाक़ है या किसी मंसूबे के तहत भारत के हालात महज़ इंतेखाब से क़ब्ल ऐसे हो जातें है जिसका पूरा असर राय शुमारी पे दिखने लगता है और राये (वोट) का शदीद पोलाराइज़ेशन हो जाता है, और अक्सरियत तपके का वोट ज़ाफ़रानी तंज़ीम को चला जाता है.  इस राये शुमारी में भी ऐन वक़्त पे हालात ऐसे ही हो गए.  जब ज़ाफ़रानी तंज़ीम शदीद ख़िलाफ़े एतेमादी का शिकार हो रही थी, अवाम बढ़ते हुए घपलों घोटाओं में हर दुसरे रोज़ हुकूमत से सवाल जवाब तलब कर रहा था तब हिन्दू शिद्दत पसंद कमलेश तिवारी का क़त्ल सियासी क़त्ल के फलसफे को मज़ीद पुख़्ता कर रहा  है.
 
फिर जिस अंदाज़ में उत्तर प्रदेश के डी.जी.पी. आनन फाननं में मीडिया इजलास को खिताब करते हुए बे सर पैर की बयान बाज़ी कर रहे थे, जिसमे उन्होंने बताया की मुजरिम गिरफ्तार हो चुके हैं और आफ.आई.आर दर्ज कर ली गई है उससे मज़ीद शक और शुबा गहराता गया की दाल में कुछ तो काला है.  
इतना ही नहीं पुलिस ने तीनों के नाम तक बता कर क़त्ल करने की वजह तक बता दी.  इतना ही नहीं ख़बरों का बवंडर आने लगा की तीनो क़ातिलों ने जुर्म क़ुबूल कर लिया है और क़त्ल की वजह कमलेश के २०१५ में दिए गए पैगम्बर सल्लम के खिलाफ ना ज़ेबा बयान को बताया है.  क्या मज़ाक़ है.  इतनी एहल, ज़हीन और हुनरमंद तो इंग्लैंड अमेरिका की पुलिस भी नहीं है तो उत्तर प्रदेश की पुलिस कब से इतनी ज़हीन हो गई.  एक बात वाज़े रहे उत्तर प्रदेश और बिहार की पुलिस काम काज के मामले में एहलियत और क़ाबिलियत के मामले हिंदुस्तान में सबसे अदना दर्जे पे फ़ाइज़ है फिर वो पुलिस महज़ २० घंटे के अंदर ना सिर्फ क़त्ल की गुत्थी को सुलझा रही है बल्कि क़ातिलों को पकड़ भी रही है.  उत्तर प्रदेश पुलिस की अफ़राद की गिरफ्तारी की थ्योरी पे मज़ीद शक इस बात से हो रहा है.

.      की जुमे बजे के आस पास क़त्ल किया और बरोज़ सनीचर को बजे कैसे पुलिस ने क़ातिलों को गुजरात सूरत और अहमदाबाद से गिरफ्तार कर लिया.  क्या क़त्ल करने के बाद क़ातिल फ़िज़ाई तय्यारे से गए थे, अपनी गाडी से या ट्रैन से.  सिर्फ हवाई जहाज़ से जाने पे ही इतनी जल्दी कोई भी शख्स लखनऊ से गुजरात पहुंच सकता है. 
.      पुलिस बोल रही है क़ातिल मोटर साइकिल पे आये थे.  तो मोटर साइकिल कहाँ से मिली.  मतलब कोई मुक़ामी अवाम उनको मदद कर रहा था.  जिसकी मोटर साइकिल पे क़ातिल आये और उसी से चले गए. 
.    अगर कोई मुक़ामी अवाम क़ातिलों की मदद कर रहा था या तो कमलेश का रिश्तेदार, दोस्त एहबाब होगा या फिर उसका जान पहचान वाला.  क्योंकि कोई भी मुस्लिम कमलेश के ऑफिस पे जाने के लिए किसी को भी अपनी मोटर साइकिल फ़राहम नहीं करेगा.
४.    पुलिस के हिसाब से क़त्ल की मंसूबा बंदी गुजरात में की गई.  तो कब की गई और उसके क्या इंटिलेजेंस इनपुट पुलिस के पास हैं.  और जब ये दोनों गुजरात से निकले तो क्या पुलिस के पास कुछ भी मालूमात नहीं आयी की उत्तर प्रदेश में किसी बड़ी शख्सियत का क़त्ल हो सकता है.  दूसरी बात इन लोगों ने सूरत में ज़ाफ़रानी कुरता सिलवाया.  तो कहाँ सिलवाया क्योंकि अगर दर्ज़ी जान पहचान वाला है तो उसने सवाल जवाब नहीं किये की मुस्लिम हो के ज़ाफ़रानी कुरता काहे को पहनते हो.
५.    पुलिस किसी मौलाना अनवारुल हक़ को क़त्ल का एहम साजिशी मान रही है और उनको भी गिरफ्तार किया जा चूका है. ये कैसे मुमकिन है की क़त्ल के मेहज़ २० घंटों के अंदर ही पुलिस को एहम साजिशी का नाम तक पता चल जाता है और गिरफ्तारी भी हो जाती है.  मतलब पुलिस को पहले से ही इस साजिश का इल्म था और अगर इल्म था तो तहफ़्फ़ुज़ के पूरे इक़दाम काहे को नहीं उठाये गए.
  .   पुलिस के हिसाब से २०१५ में प्रोफेट सल्लम के खिलाफ गलतबयानी पे मौलाना अनवारुल हक़ ने उसका सर क़लम करने का फ़तवा दिया था.  जब फ़तवा दिया गया था मतलब कमलेश की जान को खतरा था फिर उनके तहफूज़ज के पूरे इक़दाम काहे को नहीं उठाये गए.
.    पुलिस के हिसाब से कोई भी क़ातिल मुजरिमाना सोच और जुर्म का आदि और पेशावर मुजरिम नहीं हैं. फिर कैसे कोई मासूम जिसने अभी तक कोई भी जुर्म नहीं किया है क़त्ल जैसे संगीन जुर्म को अंजाम दे सकता है, वो भी मंसूबा बना के क़त्ल करना, सवाल ही नहीं उठता है.
८.   पुलिस के हिसाब से क़ातिलों का ताल्लुक़ किसी भी दहशतगर्द तंज़ीम से नहीं है.  फिर उनको इतनी बड़ी वारदात करने की तरग़ीब कहाँ से मिली, माशी और दीगर साज सामान किसने मोहिय्या किये.  पुलिस तो देशतगर्दों से ताल्लुक़ होने की बात को सिरे से नकार रही है वहीँ दूसरी तरफ मीडिया में खबरे ज़ोर और शोर से चल रही है की मक़तूल आई अस आई और आई अस आई अस के निशाने पे था.    

कुल मिला के मसले का लब्बो लुबाब ये निकल के रहा है इस क़त्ल से मुस्लिम अवाम या किसी भी तंज़ीम का कोई हाथ नहीं है.  अगर किसी ने क़त्ल किया है तो वो सिर्फ और सिर्फ कमलेश के रिश्तेदार या क़रीबी ही हैं.  दूसरी बात इस क़त्ल में सियासी बू भी रही है उसका क़त्ल किसी सियासत की हिकमत को पूरा करने के लिए किया गया है.  क़त्ल का वक़्त और शख़्स का भी भरपूर ख़याल रखा गया है.  एक इन्तेख़ाब दूसरा वही ज़ाफ़रानी तंज़ीम की गिरती हुई साख़ और अवाम में सख्त नाराज़गी.  पाकिस्तान, कश्मीर और मुस्लिम, ट्रिपल तलाक़ और बाबरी मस्जिद की हिकमत तक़रीबन ख़त्म हो चुकी थी. तो ऐसे में राये शुमारी को कैसे मुत्तासिर किया जाए सो एक ऐसे इंसान का क़त्ल करवा दो जो हिन्दू इत्तिहाद की बात करता हो और हिन्दू अवाम में मक़बूल हो फिर उस क़त्ल का इलज़ाम मुस्लिम अवाम और मौलाना पे लगा दो तमाम हिन्दू हो गए एक तरफ और वोट फिर से हमारे क़ब्ज़े में. 

कुछ नहीं ये बात एक दम वाज़े और शफ़्फ़ाफ़ है की ये क़त्ल ना तो किसी मुस्लिम ने किया है और ना ही इसके पीछे २०१५ में प्रोफेट सल्लम को दिए हुए बयान की वजह है.  बल्कि क़त्ल की वजह आपसी मन मुटाव और अज़वाजे ज़िन्दगी है.  इस आपसी मन मुटाव में ज़मीन जायदाद, सियासी मन मुटाव या रिश्ते में खटास कुछ भी हो सकता है.  इस क़त्ल में क़ातिल भी हिन्दू है, साजिशी भी हिन्दू है और मक़तूल भी हिन्दू ही है.

अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...