हिन्दू भगवा आतंकवादीओ के सत्ता में
आते ही आतंकवादी जेल से रिहा हो रहे है और निर्दोष मुस्लिम जेलों में बंद किये जा रहे
है. भगवा साधू ने जब से उत्तर प्रदेश की सत्ता
पे कब्ज़ा किया है मुस्लिम समाज के ऊपर उसका सारा नज़ला उतर रहा है. चाहे वो निर्दोष मसीहा डाक्टर कफील अहमद हों या
२६ जनवरी को हिन्दू आतंकवादीओ दूआरा मुस्लिम देश भक्तो के ऊपर आतंकी हमला करने के बाद
३ मुसलमानो की गिरफ्तारी हो या फेक एनकाउंटर में योजनाबद्ध तरीके से मुस्लिम नौ जवानो
को पुलिस दूआरा मौत के घाट उतारने की मुहिम.
या हाल ही कुशीनगर में मारे गए बच्चो के बाद निर्दोष मुस्लिम लोगों पे दर्ज
की गई ऑफ.आई.आर. जिनका इस हादसे से कुछ लेना देना नहीं है.
जिस तरह से डॉक्टर कफील को बच्चो की
मौत के बाद बलि का बकरा बनाया गया था फिर भी बच्चो के मरने का सिलसिला बंद नहीं हुआ
था उसी समय इस पत्रकार ने अपने एक लेख में योगी से पुछा था अब किस की बलि दे रहे हो. तुम अपनी नाकामी को छूपाने के लिए निर्दोष मुसलमान
शासकीय सवको के ऊपर गाज गिरा सकते हो लेकिन पत्रकारों से कोई बात नहीं छुपा सकते के
ये समूचा तुम्हारी प्रशासनिक लापरवाही का नतीजा है.
आखिरकार बुधवार को करीब सात महीने
तक हिरासत में रहे डॉ. कफील को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गोरखपुर बीआरडी मेडिकल कॉलेज अस्पताल
में बच्चों की मौत के मामले में जमानत दे दी . हाईकोर्ट के आदेश के बाद में मिले विवरण
के मुताबिक कोर्ट ने यह कहा है कि कफील के खिलाफ चिकित्सीय लापरवाही के कोई सबूत नहीं
पाए गए हैं. कोर्ट ने कहा कि उन्हें इतने महीने तक बेवजह जेल में रखा गया.
जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने आदेश में कहा, ' ऑन रिकॉर्ड ऐसी कोई सामग्री नहीं मिले है जिससे यह बात साबित हो सके कि आवेदक (कफील) ने चिकित्सीय लापरवाही की है. इसके अलावा उनके खिलाफ कोई जांच भी नहीं शुरू की गई है.'
डॉ. कफील को जमानत देने की मुख्य वजह कोर्ट ने यूपी सरकार के हलफनामे को बताया. कोर्ट ने कहा, 'यूपी सरकार ने अपने हलफनामे और खासकर उसके पैराग्राफ १६ में बच्चों की मौत के लिए मेडिकल ऑक्सीजन की कमी को वजह नहीं माना है.
बेवजह जेल में रखा गया
अदालत ने कहा कि खान को इसके बावजूद जेल में रखा गया कि, 'वह अस्पताल में मेडिकल ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी की टेंडरिंग प्रक्रिया का हिस्सा नहीं थे. आवेदक को ७ महीने तक हिरासत में रखा गया. अब उनके ऊपर किसी तरह की जांच बाकी नहीं है, इसलिए आगे उन्हें हिरासत में रखने की कोई जरूरत नहीं है.'
साधू महाराज ये नाइंसाफी तुमको बोहोत महंगी पड़ेगी, तुम तो एक साधू हो जो समाज की भलाई के कामो में अपने आपको वक्फ कर देता है फिर उसके सामने मज़हब, ज़ात धर्म कोई मायने नहीं रखते बल्कि वो इंसानियत की भलाई के लिए काम करता है. लेकिन तुमने तो साधू धर्म और उसकी मर्यादा को ही तार तार कर दिया.
लेखक अपने आप को कोई साधू महात्मा नहीं मानता लेकिन जब भी उसके पास कोई ज़रुरत मंद आता है वो उसको दुआ दिए बगैर नहीं रहता और लेखक की दुआ से कई हिन्दू परिवारों का भला हुआ है लेकिन उसने कभी अपने आप को बचाने के लिए या अपने साथिओ को बचाने के लिए किसी बेगुनाह की बलि नहीं दी.
क्योके लेखक का यकीन अपने मुर्शिद उसके बाद वली अल्लाहों पे और फिर अल्लाह पे कामिल है. अगर लेखक से कोई गलती हो जाती है तो बजाये उसपे पर्दा डालने के और कोई बलि का बकरा तलाशने के वो अपनी गलती पे अपने मालिके हकीकी के सामने पशेमान होता है.
फिर साधू महाराज आपने एक बेगुनाह को ७ महीनो तक जेल में रखा उसका ज़वाल आपके ऊपर और आपके अनुयाइयों पे आएगा. आपने अपनी साधू गिरी दिखा के बेगुनाह मुसलमानो को परेशान किया अब हमारी बारी है तैयार रहो. बचने के लिए ज़मीन तंग कर दी जायेगी तुम्हारे लिए.