Wednesday, 2 April 2025

क़ानूनी चाबुक अब फ़रेबी सहाफ़ियों पर चलना चाहिए।

अज़ीज़ नाज़रीन,

हिंदुस्तान की तक़दीर में तबाही और बर्बादी, तक़सीम की अहम् वजह बेगुनाह मुसलमानों की ग़ैर क़ानूनी गिरफ़्तारी और अकसरियत अवाम के गुनाहों की अनदेखी रही है।  एक जानिब जहाँ मासूम शरजील इमाम, उमर ख़ालिद, शिफ़ा उर रेहमान, ताहिर हुसैन जैसे सैकड़ों मुसलमान दिल्ली दंगों के इलज़ाम में आजतक ५ सालों से जेल में बंद हैं।  वहीँ कपिल मिश्रा दंगों का एहम मुल्ज़िम ५६ लोगों का क़ातिल वज़ीर क़ानून बना बैठा है। आज ५ साल बाद कचहरी ने उसके ऊपर FIR  दर्ज करने की हिदायत दी है। अदालत ने कहा पुलिस की ट्रैक रिपोर्ट के हिसाब से वोह उस जगह मौजूद था जहाँ दंगा हुआ।  यह मज़हबी तफ़रीक़ है। इसके अहम मुजरिम भारतीय ज़ाफ़रानी मीडिया के वोह सहाफ़ियों की टोली है जो हर वक़त हिन्दू मुस्लिम करते थे।  मुसलमानों का मीडिया ट्रायल कर उनके लिए जेल का रास्ता हमवार करते थे। 

मुस्लिम आला तालीमी आफ़ता यूनिवर्सिटी के तहक़ीक़ीन को जेल में ५ सालों से क़ैद कर के रखा है।  नाज़रीन ऐसे कई मामले सामने आये जिसमे मीडिया ट्रायल के बाद पुलिस ने मुस्लिम बच्चों को गिरफ़्तार किया ५ साल ७ साल किसी किसी मामले में १० और २० साल जेल में रहने के बाद अदालत को उनके ख़िलाफ़ कोई ठोस सुबूत न मिलने पर उनको बाइज़्ज़त रिहा किया गया।  तब्लीग़ी जमात बेहतरीन मिसाल है।  कैसे कैसे अलफ़ाज़ बोले गए थे मौलाना साद साहब की रूहानियत को एक झटके में दहशतगर्दों से मिला दिया था।  कारोना बम, कारोना आतंकी।  जो जिस ज़मीर फ़रोश ज़ाफ़रानी सहाफ़ी के ज़ेहन में आ रहा वोह अलफ़ाज़ दिए जा रहे थे।  लेकिन अदालत ने क्या पाया कुछ नहीं ना ही साजिश के कोई सबूत मिले और ना ही ताबिलगी जमात का एक भी मुसलमान करोना फ़ैलाने का ज़िम्मेदार पाया गया सभी बाईज़्ज़त बरी हो गए।  

जहाँ हिन्दू दहशतगर्दाना जुर्म में मुलव्विस भी पाया जाता है तो उसको सिर्फ मुजरिम मुखातिब किया जाता है और मुसलमान पर फ़ौरन दहशतगर्द का लेबल लगा दिया जाता है।  अब अदालतों को सही और ग़लत का फ़ैसला करना होगा।  कपिल मिश्रा जैसे दरिंदे, ज़ालिम, वतन का ग़द्दार, इज्तेमाई क़ातिल को अदालत को दहशतगर्द  के क़ानून के अंदर गिरफ़्तार कर सज़ा देनी चाहिए।  

वहीँ ऐसे तमाम सहाफ़ियों के ख़िलाफ़ भी कारवाही होना चाहिए जो बग़ैर तहक़ीक़ मुस्लिम नौजवानों के ख़िलाफ़ एक तरफा माहौल तैयार करने के मुजरिम हैं।  उन सबके ख़िलाफ़ तहक़ीक़ होना चाहिए की किस के इशारे पर कहने पर यह सहाफ़ी से जल्लाद और दरिंदे बन गए।  इनकी आमदनी की जांच होना चाहिए।  २०१२-१३ में इनके पास कितनी दौलत और असासे थे और २०१४ के बाद इनकी आमदनी कितनी हुई।  

इनका इनकम टैक्स देना इनके जुर्म को कम नहीं कर सकता।  कियोंके अगर एक लूटेरा डाकू क़तल करता है और लूट के माल से एक चौथाई ग़रीबों में तक़सीम कर देता है बाक़ी अपने इस्तेमाल में लेता है। तो उसका जुर्म कम नहीं होगा।  उनकी सबकी जांच होना चाहिए मुजरिम साबित होने पर सज़ा के साथ तमाम असासे और दौलत ज़ब्त करना चाहिए।  

जिन मुसलमानों को हक़ की आवाज़ बुलंद करने पर जेल में ग़ैर ज़रूरी रखा गया उनको अक़वाम ए मुताहिदा से अमन और इंसानियत के मुहाफ़िज़ के तमग़े और एजाज़ से सरफ़रोज़ कर इज़्ज़त अफ़ज़ाई मिलना चाहिए।  जैसे नेल्सन मॉडेला को काले अवाम के हक़ के लिए हुकूमत से लड़ने पर जेल में रखा गया, बाद में उनको इज़्ज़त बक्शी गई।  

शरजील इमाम आला तालीमी आफ़ता तहक़ीक़ के तालिब इल्म हैं, उनके जैसा आला ज़हन और आला तालीम शायद ही किसी तालिब ए इल्म ने ली होगी।  वोह अपनी यूनिवर्सिटी के वाहिद तालिब ए इल्म हैं जो इतनी आला तालीम ले कर हर शेवे में सर ए फ़ेहरिस्त रहे।  

 

सहाफ़ी ज़ुबेर


अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...