अज़ीज़ नाज़रीन,
माज़ी
भारत में ज़मीनदार, पटवारी, राजन, राजपूत अपने महलों कोठीयों में रंडियों को नचवाया
करते थे। जैसे जैसे जदीद तकनीक आई वैसे वैसे
इन तवाइफ़ों की किस्मत भी बदल गई। जदीद (नए)
भारत में अब रंडियें या तवायफें किसी ख़ास महल की ज़ीनत ना हो कर हर ख़ास ओ आम के तफ़रीह
का सामान हो गई और उनको केमेरे से फिल्मा कर बॉलीवुड जैसी इंडस्ट्री ने आम कर दिया।
इस
गहमा गहमी में तवायफ़ें या रंडियें अपने आप को रसूख़ दार और मोअज़्ज़िब समझने लगी। यहाँ तक की उनकी आमद ओ रफ़्त मज़हबी महफ़िलों और पाकीज़ा
जगहों में भी होने लगी। चाहे वोह बाबरपुर
में बाबरी मस्जिद में हिन्दू डाकुओं के डाका डाली हुई ज़मीन पर मुतनाज़ा राम मंदिर की
इफ़्तेताह हो या सऊदी अरब के मदीना शहर में गई बॉलीवुड की ओबाश अदाकारा बरहना स्मृती
ईरानी की आमद।
जी
हाँ नाज़रीन १० जनवरी को बॉलीवुड की अदाकारा स्मुर्ती ईरानी पाकीज़ा शहर मदीना में बरहना
अंदाज़ में बगैर हिजाब या बुर्क़े के दाख़िल हुई।
इस बेशर्म बेहया ख़ातून को इतनी लाज नहीं आई की मज़हब इस्लाम में पेट, छाती और
बालों की नुमाइश करना हराम है। जब हिन्दू मज़हब
की बात होती है तो यह बेहया ख़ातून बड़े बड़े बोल बोलती है। तब इसके जज़बात टूट जातें हैं तो किसी दुसरे मज़हब
की बेहुरमती करते वक़्त इस बेहया बेशर्म ने कैसे नहीं सोचा की इसकी बेहयाई और नंगे पेट
छाती और बालों की नुमाइश से मुसलमानों के जज़बात की कैसी धज्जयां उड़ेगीं।
इतना
ही नहीं इस बेशर्म ख़ातून के साथ पूरा तवाइफ़ ख़ाना था और दलाल। इस स्मुर्ती ईरानी ने अपने सर पर टिकी लगा रखी थी
और इसके साथ मौजूद ख़ातून नंगी टाँगे मिडी और चड्डी पहन कर हुदूद मदीना मस्जिद ए क़ुबा
में फोटो शूट करते हुई पकड़ी गई।
उसकी
इस नाज़ेबा हरकत और नंगा जिस्म पेट छाती पैर और बाल दिखाने पर पाकिस्तान ने सख़्त तनक़ीद
और सऊदी हुक्काम से जवाब तलब किया। उसके ऊपर
ज़ाफ़रानी लंगूरों को अंगार ऐसी लगी की पाकिस्तान की निस्बत से ऊल जलूल ज़लालत भरे मज़मून
शया किये। पाकिस्तान को क्या हर ज़मीर वाले
मुसलमान को तकलीफ़ होगी। हाँ अब जो काफ़िरों
के हामी हैं मुनाफ़िक़ भारत में और इस्लामिक मुल्कों में उनको नहीं होगी। बल्कि जो तनक़ीद कर रहें हैं यह मुनाफ़िक़ मोदी गुलाम
काफ़िर दहशत के हामी उनको शिद्दत पसंद बोलेगें और इस मसले को हलके में ले कर खारिज करने
की कोशिश करेगें।
जो
स्मृती ईरानी के नंगे पेट छाती पैर और बालों के साथ टिकी लगा कर मदीने में फोटो शूट
करने वाले अमल को मामूली क़रार दे रहें हैं उन मुनाफ़िक़ों काफ़िरों मोदी और भारत के
वज़ारत ख़ारजा से पूछना चाहता हूँ किसी मुस्लिम को भारत में खुले में नमाज़ अदा करने की
इजाज़त नहीं है। फ़ौरन गिरफ्तारी हो जाती है। अगर मग़रिब नमाज़ का वक़्त जा रहा है कोई ऐसे हालात
में है की मस्जिद दूर दूर तक नहीं है और उसने अपना गमछा बिछा कर नमाज़ अदा कर ली तो
होती है उसकी गिरफ़्तारी।जब्कि उसने ना किसी
मज़हब की दिल आज़ारी की और ना ही किसी के जज़बात
को ठेस लगी फिर भी उसको गिरफ़्तार किया जाता है।
एक
सवाल और है ओर्रिसा के पूरी के मंदिर में तमिल नाडू केरला के मंदिर में किसी भी ग़ैर
हिन्दू को जाने की इजाज़त नहीं है। अगर कोई
मुस्लिम ख़ातून अपने मज़हब के हिसाब से बुर्क़ा पहन कर फोटो शूट करवाती है या कोई मुस्लिम
इस्लामिक लिबास के साथ गमछा डाल कर मंदिर में जाता है तो क्या उसकी गिरफ़्तारी नहीं
होगी। फिर कैसे कोई पंडित, नंगी टांगों वाली ख़ातून और नंगा पेट छाती बाल ले कर टीकी लगा कर स्मृति ईरानी मदीना में दाख़िल हुई। में स्मृती ईरानी से कहूंगा साबारिमाला में औरतों को दाख़िल होने की इजाज़त दो।
क्या
हिन्दू मज़हब के ही जज़बात हैं मुस्लिम मज़हब के नहीं। फिर जब तुम किसी मुल्क में जा रहे तो तो उसके क़ानून
उसकी सक़ाफ़त का ख़याल रखना ज़रूरी होता है। यह
एक प्रोटोकॉल होता है जिस मुल्क में जाओ उसके क़ानून की हिफाज़त करो। अगर नहीं की गई है तो काफ़िर मुल्क के उस मुजरिम
उसके सरबराह और सरकार के खिलाफ सख़्त क़ानूनी हिकमत अमली होना चाहिए।
लव रात्री के नो रोज़ तक गोश्त की दुकाने बंद कर दी जाती हैं। कावड़ यात्रा के दौरान यात्रा के रास्ते में आने वाली तमाम गोश्त की दुकानों को ताला लगा दिया जाता है। और ऐसा किसी हिन्दू दहशतगर्द का हुकुम नहीं होता है बल्कि हूकूमती हुकुम नाफ़िज़ किया जाता है। अगर किसी ने हुकुम उदूली की तो होती है उसकी गिरफ़्तारी और उसको पुलिस क़ानून देता है सख़्त अज़ीयत। उसके ऊपर रा सू का लगाया जाता है।
हाल ही में काफ़िर दहशत ने बाबरपुर की बाबरी मस्जिद पर डाका डाली हुई ज़मीन पर एक मुजस्समा रखा और दहशतगर्दों के सरबराह ने मुसलमानों से लुटे हुए माल की तक़सीम पर २२ जनवरी को हूकूमती आम बंद का एलान किया। इतना ही नहीं शराब नोशी गोश्त खोरी को उस मख़सूस दिन सख़्त बंद कर दिया।
तो क्या वजह है की तुम अपने मुल्क में ऐसे क़ानून नाफ़िज़ कर कर रहे हो जो मुस्लिम क्रिस्चियन दलित सिख अवाम को नामंज़ूर होते हैं। क़ानूनों की खिलाफवर्जी करने वाले की होती है गिरफ़्तारी फिर दुसरे मुल्क में जा कर नंगे नाच के आ रहे हो। पेट चड्डी जंगें छाती बाल बिंदी दिखा रहे हो। वोह सब तुम्हारे मुल्क में चलता है दूसरों के मुल्क में जा कर करोगे तो होगी गिरफ़्तारी।
ऐसी मालूमात हासिल हुई है इस स्मृती ईरानी का किरदार ऐसा है जिस दोस्त के घर में पनाह ली उस ही के ख़ाविंद पर डाका डाल कर भगा ले गई और उससे शादी कर ली।
सहाफ़ी ज़ुबेर