अज़ीज़ नाज़रीन,
संघियों, कट्टरपंथी काफ़िरों और बीजेपी वालों में सदा
ही ज़हानत का टौंटा होता है। मुग़लों के किये
हुए काम को या तो अपना नाम देतें हैं या नक़ल कर के अपने काम करते हैं। लेकिन नक़ल में अक़ल नहीं लगाते और होतें हैं रूसवा।
नाज़रीन गाये के ऊपर साधू का मखौल उड़ाने लतीफा लिखने के बाद अब संघी समाज की बारी है।
एक संघी, एक सिख, एक हिन्दू एक मुस्लिम के बच्चे
विलायत में पढ़ने जातें हैं। अब उनके वाल्दैन
उनको पालम हवाई अड्डे पर लेने पहुचतें हैं।
सबसे पहले मुस्लिम का बच्चा नज़र आता है तो वोह बोलता है
यह आ गए मेरे नवाब ज़ादे
फिर सिख का बच्चा नज़र आता है तो वोह बोलता है
यह आ गए मेरे साहब ज़ादे
फिर हिन्दू का नज़र आता है तो वोह बोलता है
यह आ गए मेरे राम ज़ादे
अब बारी संघी की थी उसने नक़ल की लेकिन अक़ल नहीं
लगाई और बोल बैठा
यह आ गए मेरे हरामज़ादे।
सहाफ़ी ज़ुबेर की पेशकश