मुग़लों की हाकिमियत में अमृत ही था।
अज़ीज़ नाज़रीन
मौजूदा बादशाह मोदी ने मुग़ल बग़ीचे के नाम अमृत उद्यान रख दिया है। उसने माज़ी की नोट बंदी, ताला बंदी जैसे तरीक़ेकार हिकमत को बरक़रार रखते हुए ठीक ८ बजे रात को बोल दिया कल से मुग़ल को अमृत नाम से जाना जाएगा। अब इस तरीकेकार हिक़मत से कुछ बातें साफ़ हो जाती हैं। अगरचे मोदी मौजूदा दौर के भारत का ज़ालिम तरीन, क़ातिल दरिंदा सिफ़त बादशाह है लेकिन उसने भी मुग़लों की अमृत और शीरी ज़ुबान की ताईद कर ली और औरंगज़ेब रेहमतुल्लाह अलैहे का मुरीद हो गया। अब मोदी कब जा कर औरग़ज़ेब रहीमुल्लाह के आस्ताने पर सजदा रेज़ होने जा रहा है।
नाज़रीन मोदी ने मुग़ल बाग़ीचे का नाम अमृत उद्यान रख तो दिया लेकिन भारत में मौजूद ज़हरीले कीड़ों की ज़ुबान से अमृत कहाँ टपकता है। वोह तो ऐसी बोली बोलतें हैं जो ज़हरीली होती है। दूसरी बात उस गार्डन में एक से बड़े एक फूल मौजूद हैं। जिनमे १०००० से ज़ाईद टूलिप फूलों की क़िस्मे मौजूद हैं। गुलाब की १३० से ज़्यादा क़िस्मे जिनमे गुलाब मुस्तो की ख़ासियत है। गुलाब के अलावा ट्यूलिप, लिली, जलकुंभी और डैफोडील्स सहित मौसमी फूलों की 70 से ज़ाइद किस्में और पेड़ों, झाड़ियों और टहनियों की तक़रीबन ५० किस्में मौजूद हैं।
जो मुगलों ने फ़ारस, मिस्र, तुर्की, मलेशिया, जापान से मगवाये थे, यहाँ तक की गेंदा जो आज कल भारत में हिन्दू मूर्तियों पर चढ़ाया जाता है वोह भी अज़रबाइजान से मगाया गया था। ज़ाहिर यह हो रहा है जिस देश में जो चीज़ मिलती है वही नसीब होगी। मुस्लिम देशों में अमृत मिलता था तो तो मुग़ल गार्डन का नाम अमृत रखा गया। अगर भारत का एक भी फूल उसमे होता तो उसका नाम ज़हरीला उद्यान रखा जाता। वैसे जदीद भारत का जदीद नाम ज़हरीला खेत हो चूका है जहाँ ज़हरीली काश्त की जाती है।
यह तो मौजूदा बादशाह मोदी की सोच है जो उन्होंने मुग़ल दौरे ख़िलाफ़त के बाग़ीचे को अमृत नाम दिया जिससे ज़ाहिर हो रहा है की मोदी की सोच मुग़लों के लिए संघी दहशत और बीजेपी से अलहदा है। मुग़ल जो सदा ही सुख़न शीरी में यक़ीन रखते थे, गंगा जमुनी तहज़ीब में काम करते थे। उनके बाद उनके दिए हुए नाम को अमृत लक़ब से मुखातिब कर मोदी ने दिखा दिया की जिन मुग़लों के ऊपर जो इलज़ाम तराशी की जाती है उनके खिलाफ ज़हर अंगेशी की जाती है वोह ग़लत है। वहीँ ज़ाफ़रानी जो सदा ही ज़हर के बीज बोते थे उनका कहीं भी नाम आता है तो सिर्फ मार काट दंगे फसाद और ज़हरीली बद ज़ुबानी में ही अव्वल आता है, इन ज़हरीली कीड़ों और उनके अलफ़ाज़ से सदा ज़हर टपकता है।
यह तो अपने अपने नसीब की बात है जितना मुग़लों को बदनाम किया मालिके कायनात ने दहशत के आक़ा से ऐसा काम करवा लिया की आती दुनियां को यही इल्म होगा की इस बाग़ीचे का माज़ी नाम मुग़ल था जो मुस्तक़बिल और हिंदुस्तान की जदीद तारीख़ में अमृत के नाम से मशहूर हुआ। मतलब हर एक मुग़ल "अमृत" यानी वली सिफ़त, मिठास बाटने वाला और उनका नाम तारीख़ के सफ़ों से कभी भी ख़तम होने वाला नहीं है।
वहीँ अगर आज़ाद भारत के पहले दहशतगर्द का नाम लिया जाएगा एक ऐसे क़ातिल दरिंदे जल्लाद का नाम लिया जाएगा जिसने गांधी जैसी अज़ीम शख्सियत को हलाक किया सिर्फ इसलिए की वोह गंगा जमुना तहज़ीब के हामी थी और हिन्दू मुस्लिम दंगों के खिलाफ एहतेजाज कर रहे थे।
वहीँ दरमियानी हल्क़े में हिन्दू दहशत का पर्दा फ़ाशा करने वाले अज़ीम पुलिस अफसर हेमंत करकरे की शहादत के लिए ज़िम्मेदार था। उसपर ज़ुल्म देखिये जिन हेमंत करकरे ने वतन के लिए जान क़ुर्बान कर दी उनको बद्दुआ दी गई और उस नागिन की बद्दुआ भी किस को लगी एक ऐसे पुलिस अफसर को जो दहशतगर्दी के खिलाफ जंग लड़ा और जामे शहादत नोश की थी। उस पर ज़ुल्म देखिये उस ज़हर की काश्त पहुंच गई एवांन के गलियारों में। मुग़लों ने बागीचा बनाया जिसको दस हज़ार किस्म के मुख़्तलिफ़ फूलों से आरास्ता किया, वहीँ ज़ाफ़रानी बेशर्म रंग ने सिर्फ एक रंग का फूल नारंगी लगाया और एवांन के गलियारों में की ज़हर काश्त की।
मौजूदा बादशाह दरिंदा मोदी के मुग़ल बाग़ीचे को दिया गया नया नाम यह ज़ाहिर कर रहा है, मुग़लों की हाकिमियत में अमृत था वहीँ ज़ाफ़रानी हाकिमियत में ज़हर।
सहाफ़ी ज़ुबेर