अज़ीज़ नाज़रीन,
गुजिश्ता एक हफ्ते से किसी नौटंकी के ऊपर नौटंकी देख रहा था। किसी नौटंकी का नग़्मा "बेशर्म रंग" शाया हुआ जिसके ऊपर तमाम ज़ाफ़रानी ना सिर्फ बेशर्म हो गए बल्कि बरहना हो कर नंगा रक़्स करने लगे। इन दिमाग़ी मुफ़लिसों पर अब तो ना गुस्सा आता है और ना ही हँसी। जो हर मुद्दे को इस्लाम और पैग़म्बर तक से मुनसलिक कर देतें हैं।
मेने बहैसियत सहाफ़ी यह नग़्मा देखा और मुझे इसके अंदर ऐसा कुछ भी नहीं लगा की किसी भी मज़हब की तोहीन की गई हो या हिन्दू मज़हबी पेशवा का मज़ाक़ बनाया गया हो। बल्कि मुझे नग्मे की मौसीक़ी बोहोत पसंद आई जो आवाज़ है वोह दिल काश है हाँ सीन बरहना हैं तो आज कल के माहौल में अवाम वही तो देखना पसंद करता है। जो भी बीजेपी वाले और ज़ाफ़रानी गुंडे दंगा फसाद कर रहें हैं उनमे से ९९ फीसद तो फाहशी, बरहना मस्तूरातों को देख कर ना जाने क्या क्या करते रहतें होंगे। कई बीजीपी के रकून असेंबली और पार्लियमान एवान में बरहना (ब्लू) फिल्मे देखते हुए पकड़े गए हैं। और सिर्फ ज़ाफ़रानी अंगोछा लपेट लेने से हिन्दू मज़हब की बेइज़्ज़ती हो गई। क्या फलसफा है।
अगर इतनी ही हिन्दू मज़हब की परवाह है तो उत्तराखंड की उस मासूम बच्ची जिसको के बीजेपी के वज़ीर के फ़रज़न्द ने खूब इतेमाल किया और उसको क़तल ही इसी वजह से किया की योगी, मोदी और अमित शाह को नफ़्सी और जिस्मानी मुतमईन करने का दबाव डाल रहा था उसका आशिक़। ऐसे मुद्दों पर कहाँ चली जाती है इनकी मज़हबी अक़ीदत। क्या किसी भी मर्द को रातों में नफ़्सी और जिस्मानी मुतमईन करने की एक आम हिन्दू सक़ाफ़त है अगर नहीं तो ऐसे मुद्दों पर हिन्दू संस्कृति कहाँ चली जाती है।
हर मुद्दे पर इनको इस्लाम ही काहे को नज़र आने लगता है। अगर मुद्दा ज़ाफ़रानी अगिया से हिन्दू मज़हब को ठेस पहुंची है तो उस नग़्मे में हरे रंग की अगोछा भी लपेटे हुए है। लेकिन यह दिमागी मुफ़लिस हर मुद्दे को इस्लाम और पैग़म्बर से मुनसलिक कर देतें हैं। अगर फिल्म में राम के किरदार में शाहरुख होते और सीता ऐसे ही बरहना रक़्स करती ज़ाफ़रानी अगोछा बाँध कर और लक्ष्मण सीता को बरहना देख कर तरसता रहता तब भी तुमको किसी भी मज़हब पर ऊँगली उठाने का कोई हक़ नहीं है। सीधे सीधे तुम डायरेक्टर प्रोडूसर को तम्बीह कर सकते हो।
बीजेपी की हुकूमत का वज़ीर असेम्ली काम काज ने तो शाहरुख को एक ही चेलेंज दिया था। में तीन चेलेंज करता हूँ।
एक बॉलीवुड में कनाडा का नागरिक या जम्मू से हकाला गया भारत में पनाह गुज़ीन और तमाम ज़ाफ़रानियों, बीजेपी, संघी दहशतगर्द, शिद्दत पसंदों को क्या वोह ऐसी फिल्म बनायेगें जिसमे सीता देवी ज़ाफ़रानी अंगोछे के साथ बरहना रक़्स करें और उसमे अब्दुल के फ़रज़न्द के साथ सीता का इश्क़ बताया जाए। उसमे लव जिहाद का ज़ाविया भी कवर हो जाएगा। फिर सीता देवी अपने ख़ाविंद राम और आधा खाविंद लक्ष्मण को छोड़ असली आशिक़ अब्दुल के फ़रज़न्द के साथ भाग जाए। जदीद भारत है उसमे कुछ भी हो सकता है।
दूसरा रामायण के मुस्न्निफ को। जदीद भारत नई कहानी लिखो जिसमे सीता का इश्क़ अब्दुल के फ़रज़न्द के साथ दिखाया जाए। और जिस तरह से माज़ी के रामायण में सीता अपने आशिक़ रावण के साथ भाग खड़ी हुई थी आज के दौर के रामायण में अब्दुल के फ़रज़न्द के साथ भाग जाए।
तीसरा चेलेंज और वोह हक़ीक़त पर मबनी है। हिन्दू शिद्दत पसंदों का महज़ ज़ाफ़रानी अगोछे से मज़हब खतरे में आ जाता है आज के दौर में अगर सीता होती तो वोह किसी रावण के साथ भागने के बजाये अब्दुल के फ़रज़न्द के साथ ही भागती।
उसकी वजह है अब्दुल के फ़रज़न्द के पास क़ुव्वत और ताक़त की कोई कमी नहीं है गाये के गोश्त में बोहोत पावर होता है। और राम ठहरा घास पूस खाने वाला। वोह तो सीता को आज के दौर के "बेशर्म रंग" वाली हालात में भगवा अंगोछा लपेटे हुए देखे तो अपने नफ़्स पर हाथ रखते ही पानी छोड़ देगा। बाक़ी का काम फिर अब्दुल के फ़रज़न्द को ही करना होगा।
नाज़रीन इतनी लम्बी चौड़ी तहरीर करने के पीछे हक़ बयान करना है। इन दिमागी मुफ़लिसों को हर मुद्दे पर मुस्लिम ही सॉफ्ट टारगेट नज़र आतें हैं। बीजेपी की हुकूमत का वज़ीर असेंबली काम काज की बेहूदा मिसाल और बयान पर धोने के बाद कुछ दिमाग़ी मरीज़ों को धोने की बारी है।
कुछ संघी बोल रहें हैं यह तो मोदी जी की इन जेहादिओं को बढ़ावा देने की नीति की वजह से हुआ है। सबका साथ सबका विकास जैसी बातों से इनकी तरक़्क़ीयाती अमल करने की कोई ज़रुरत नहीं है।
हम भी यही चाहतें हैं। बिलकुल नारा बदलो। अभी तो बीजेपी, मोदी, संघ और शिद्दतपसन्द काफिरों को बोहोत कुछ भोगना है। जिस जिस मुद्दे पर बड़े से बोलते थे लेकिन वोह काम करते नहीं थे। अब ऊपर वाले की लाठी पड़ रही है तो औक़ात पर आ रहे हो। नहीं चाहिए तुम्हारा झूठा सबका साथ सबका विकास। बोल ज़ोर से हिन्दू का साथ हिन्दू का विकास। मुसलमानों के लिए काम करोगे सिफर, ढिंढोरा पीटोगे जग भर। अब ऐसा नहीं चलेगा
वैसे भी एक के बाद एक मोदी, बीजेपी की जानिब से किये गए वादे जुमला साबित हो रहें हैं। अमित शाह के एतेराफ के बाद की वोह एक जुमला था ऐसे १५ लाख किसी के भी खाते में नहीं आते। चुनाव में ऐसी बातें बोली जाती हैं, लेकिन जनता खुद भी समझती है की यह पूरा होने वाला नहीं है।
वज़ीरे दाखला के १५ लाख के दावे को जुमला बताने के बाद हूकूमते हिन्द के वज़ीरे ख़ारजा जयशंकर ने सबका साथ सबका विकास के दावे की पोल खोल कर रख दी। अभी तीन रोज़ क़ब्ल जब पाकिस्तान के वज़ीरे ख़ारजा मोहतरमा हीना रब्बानी खार और मोहतरम बिलावल भुट्टों ने हिंदियों की पिटाई की तो कुट पिट के एक सहाफी इजलास में जयशंकर बोलतें हैं सबका साथ……… हिन्दुस्तान में मुमकिन नहीं है। जिसके ऊपर मेने बतौर सहाफी ख़बरनामे पर उनकी खूब खिचाई भी की है।
Zuber