Wednesday, 19 October 2022

अल्लाह के वली बनाम सामरी की गोशाला।

अज़ीज़ नाज़रीन,

अल्लाह के वालिओं पर तनक़ीद करने वालों उनके आस्ताने की जालिओं को बोसा देने पर शिर्क, बिदअत, कुफ्र बताने वालों।  वालिओं के दर पर अर्ज़ी लगाने को गुनाह बताने वालों यह सांबरी की औलाद तो एक मुजस्समें से अर्ज़ लगवा रही है और कुफ्रिया अक़ीदा की नंदी बैल के कान में अपनी हाजत रखने से पूरी होती है।  सांबरी ने भी यही किया था गाये की कटी गर्दन रख कर बछड़ा बना दिया था फिर वोह बोलता था और लोगों की हाजत पूरी करता था।  लेकिन वोह कुफ्र था जादू था कियोंके सांबरी एक जादूगर था और उम्मते मुस्लिमा में निफ़ाक़ डालने आया था।  जब हज़रते मूसा तूर से ४० दिन बाद अल्लाह की किताब ले कर लौटे तो आपने जलाल में अपने भाई हारुन अलैहे सलाम की दाढ़ी मुबारक नोच ली और बोले में उम्मत को तुम्हारे हवाले कर के गया था यह क्या हाल बना दिया।  तब आपने बोला उम्मत बाग़ी हो गई थी वोह मेरा क़तल कर डालती और उम्मत में निफ़ाक़ बे हद बढ़ जाता क़त्ले आम शुरू हो जाता इसलिए में ख़ामोश रहा। 

आज वही सामरी जादूगर हिन्द से आया और उम्मते मुस्लिमा में निफ़ाक़ डालने की नियत से इस्लामिक रियासत दुबाई में गोशाला क़ायम कर गया। अब वोह इल्मी चैनल वाले ऐसी बातों पर कुफ्र का फतवा नहीं देंगें अगर दिया तो मौजूदा नाइंसाफ, सामरी का ग़ुलाम हाकिम रियासत के ख़िलाफ़ बग़ावत के इलज़ाम में इनका सर धड़ से जुदा कर देगा। 

यह वही इल्मी चेंनल के ख़ास मौलाना हैं जो वालिओं के ऊपर तो तनक़ीद करतें हैं लेकिन इस्लामिक रियासतों में होने वाले हक़ीक़ी कुफ्र, शराब नोशी, फाहशी, जिस्म फरोशी, रक़स, हिंदी सिनिमा, जूआ ख़ाना, ख़िन्ज़ीर का गोश्त पर ख़ामोशी इख़्तेयार करतें हैं।  शायद हाकिमे वक़्त से ख़ौफ़ ज़ादा होंगे।  लेकिन हम तो बोलेगें, हिन्द में रह कर भी बोलेगें और अगर मौक़ा मिला ऐसी इस्लामिक रियासतों में जाने का तो वहां पर भी ग़लत को ग़लत बोलेगें।  किसी हाकिम से नहीं डरेगें सिवाए अल्लाह उसके रसूल और बुज़ुर्गाने दीन (वली)।  

जैसा की आप हज़रात को इल्म होगा इससे क़ब्ल ख़ाकसार के मज़मून "अल्लाह के बरगुज़ीदा बन्देनाम से शाया किये जा चुके हैं। गर आप हज़रात ने उन मज़ामीनों का मुताला किया होगा तो आपको अल्लाह वालों की कश्फ़ और करामात का इल्म भी हुआ होगा।  अल्लहा के सच्चे वली महज़ नज़रों से इंसान की तक़दीर पलट सकतें हैं। जिसका ज़िक्र अल्लामा इक़बाल ने अपने अशआर में किया है

 "निगाहें मर्दे मोमीन से बदल जाती हैं तक़दीरें…….,

…….. जो हो ज़ौक़े यक़ीन पैदा तो कट जाती हैं ज़ंजीरें

हज़रात कुछ मुनाफ़िक़े इस्लाम हिन्द में संघी और ज़ाफ़रानी तंज़ीम बीजेपी के नुमाइंदे, तमाम आलम में यहूद और नसारा के एजेंट कुछ ऐसे कामों में मुलव्विस रहतें हैं जिसकी वजह से इस्लाम और मुसलमानों में तफ़रीक़ क़ायम रहे।  लेकिन बारी इलाह वक़्त वक़्त पर ऐसे ग़लीज़ और मुँह से गंदगी निकालने वालों को माक़ूल जवाब देता रहता है। 

यह कोई शैख़ तौसीफ उर रेहमान है दज्जाल का फितना नज़र आता है इसको ग़ौसुल आज़म, ग़रीब नवाज़ महबूबे इलाही जैसे बुज़ुर्गाने दीन और वालिओं से लिल्लाहि बुग्ज़ और कीना है।  यह शख़्स अपने आपको नबी का उम्मत्ती बोलता है और इस्लाम का ठेकेदार समझता है लेकिन इसको इसके मकतब में इतना नहीं सिखाया गया की ज़ईफ़ लोगों और वफ़ात कर गए मोमीन की शान में बदकलामी नहीं करना चाहिए हत्ता के वोह बदकार ही कियों ना हो।  फिर यह शख़्स इल्मी चेंनल पर कर ग़ौसुल आज़म और ग़रीब नवाज़ की शान में अदना दर्जे की बदकलामी करता है।  सतगफ़िरूल्लाहा  बोलता है "अरे जो मर गया, इस्तंजा नहीं कर सकता, अपने कपडे नहीं बदल सकता और तुम उसको गोसूल आज़म बोल रहे हो।    

दूसरा है शैख़ मेराज रब्बानी हफ़ीज़उल्लाह वोह ज़ैनुल आबेदीन और इमाम जाफर सादिक़ रज़ियल्लाह के शान में बदकलामी करता है।  यह लोग तो अपने आपको आलिम बोलतें हैं फिर इनको इतना इल्म कियों नहीं आया की एक वफ़ात पाए हुए मोमीन की शान में बदकलामी नहीं करना चाहिए।  तुम इनको बुज़ुर्ग तस्लीम करो या ना करो लेकिन उमर रसीदा तो थे हज़रत ग़रीब नवाज़ ९२ साल में पर्दा किये वैसे ही गोसूल आज़म और तमाम वली ६० साल के बाद पर्दा किये होंगे तो तुम्हारी तालीम का दायरा इतना महदूत है की एक बूढ़े शख़्स को सिर्फ इसलिए अदना दर्जे से मुखातिब कर रहे हो कियोंके उनकी करामात पर तुमको यक़ीन नहीं है।  

तीसरी बात यह तमाम इल्मी चेंनल वाले नबी मुकर्रम की सिफ़त बयान करतें हैं अपने दुश्मनों को माफ़ करने की हदीस बतातें हैं नबी की सभी से हुस्ने सुलूक यहाँ तक यहूद और कुफ्फारे मक्का से भी नरमी और खुश असलूबी से बात करने की सिफ़त बतातें हैं लेकिन खुद उस पर अमल नहीं करतें।  अदना दर्जे की जुबां से एक बुज़ुर्ग को मुखातिब करते हो। 

इससे ज़ाहिर हो रहा है की तुम सभी क़ादियानी दज्जाल के फ़िरक़े से हो।  मिर्ज़ा गुलाम एहमद क़ादियानी भी अपने को आलिम कहता था, मसनद पर बैठ कर तक़रीरें करता था।  लेकिन जब शैतान हावी हुआ और अल्लाह ने लानत का तोग गले में टांगा तो गुमराही उसका मुक़्क़दर बन गई। पैसों के लिए अंग्रेज़ों की ग़ुलामी ले ली और कर दिया नबूवत का दावा।  उस दौर में हम तो नहीं थे लेकिन जहाँ तक इल्म हुआ है उसने भी वालिओं से बग़ावत शुरू की थी, जो नबूवत के दावे पर जा कर रुकी।  और अल्लाह ने उसको ही जहन्नम का ईंधन बना दिया।  जब मरा था उसके मुँह से पख़ाना निकल रहा था। 

फिर जो लोग ज़ैनुल आबेदीन, इमाम जाफर सादिक़, ग़ौसुल आज़म, ग़रीब नवाज़, महबूबे इलाही पर तनक़ीद करतें हैं मतलब आले नबी नस्ले नबी और सय्यद सादगान पर तनक़ीद करतें हैं और दावा नबी की मोहब्बत का भारतें हैं।  या फिर उनको हदीसे क़ुदसी पर यक़ीन नहीं और उसको झुटला रहें हैं।  जिसका मफूम हैं

अल्लाह ने फ़रमाया जिस बन्दे ने अल्लाह के वली से बुग्ज़ रखा उसकी शान में बदकलामी की और जिस मोमीन बन्दे ने सूद खाया अल्लाह का उसके खिलाफ एलान जंग है। 

जॉर्जिस के जैसे यह मौलाना शैख़ तौसीफ उर रेहमान भी जेल जा चूका है।  इसके ऊपर इस्लामिक स्टेट जो की यहूद की पैदा करदा दहशतगर्द तंज़ीम थी उसके लिए फण्ड कलेक्ट करने का इलज़ाम था।  इस्लामिक स्टेट सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम अवाम में निफ़ाक़ डालने के लिए तैयार की गई थी। 

अगली नशिस्त में ग़ौसुल आज़म की करामात के बारे में ज़िक्र करूंगा जिसको यह जॉर्जिस और मौलाना शैख़ तौसीफ उर रेहमान जैसे लोग मज़ाक़ बनातें हैं। 

Zuber

अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...