अज़ीज़ नाज़रीन
नाज़रीन जिस हिसाब से सूबे शुमाल में गुजिश्ता दो दिनों में दलित अवाम के ऊपर हादसात का क़ेहर टूटा है वोह तो अपनी जगह है ही लेकिन उसके ऊपर इन्तेज़ामियाँ का मनफ़ी किरदार खुल कर सामने आया है। चश्मदीदों और हादसे में ज़िंदा रहने वाले अफ़राद ने मीडिया के रू बरू साधू की पुलिस और एस पी पर सख़्त इलज़ाम लगाए हैं।
एक चश्मदीद का कहना है जैसे ही ट्रेक्टर ट्रॉली तालाब में गिरी तो वोह सब भागते हुए उनकी तीमारदारी के लिए पहुंचे। पुलिस इन्तेज़ामियाँ को फोन लगाया लेकिन पुलिस की शदीद ग़फ़लत देखने को मिली। दूसरी एहम बात उन्होंने बताई की कुछ जाने ज़िंदा थी अगर उनको वक़्त पर तिब्बी सहूलत फ़राहम की जाती तो जाहांबाक होने वालो की अदद कुछ कम होती।
तीसरी अहम बात बताई हलाक शुदा अफ़राद को उनके अहले खाना के हाथों से चूरा कर वापिस नदी में फेका जाने की हिकमत पुलिस ने की थी।
चश्मदीद ने बताया एक बच्ची को हमने पानी से निकाला वोह उस वक़्त ज़िंदा थी लेकिन पुलिस की छीना झपटी में उनकी मौत वाक़े हुई।
जब उनसे पूछा गया की पुलिस ऐसा कियों करेगी वोह तो वक़्त पर पहुंच गई थी।
उस पर चश्मदीद ने बताया की पुलिस हमें मदद फ़राहम करने नहीं पहुंची थी बल्कि हमको ख़ौफ़ज़दा करने और मरे हुए लोगों को वापिस से पानी में डाल कर सबूत मिटाने पहुंची थी ताके मरने वालों की अदद का किसी को इल्म ना हो पाए।
जब उनसे छीना झपटी का कोई सबूत है तो उन्होंने कहा सब वीडियो मौजूद हैं और जांच पर आये आला ओहदेदारों को हमने फ़राहम किये हैं।
हॉस्पिटल में कोई पुरसाने हाल ना था।
ना डॉक्टर ना नर्स और ना ही कोई दीगर अमला।
सिर्फ चौकीदार ने तीमारदारी की और ड्रिप वगेरा लगाई।
नाज़रीन अब मुद्दे पर आतें हैं। दिल्ली के सुन्दर नगरी हल्क़े में बरोज़ हफ्ते देर रात एक मनीष नाम के शख्स की कुछ फ्रिंज एलिमेंट्स बाहरी अनासिरों ने क़तल कर दिया। ऐसा माना जा रहा है की वोह शख्स दलित तबक़े से था। फिर किया था सूबे शुमाल में हुए इन्तेज़ामियाँ ग़फ़लत पर पर्दापोशी करने के लिए हिन्दू दहशतगर्द और गोडसे की औलाद कपिल मिश्रा वीडियो शाया करता था हमारे दलित भाई को क़तल कर दिया और उस वीडियो में बोहोत से नाज़ेबा अलफ़ाज़ बोलता है। अब सवाल यह उठता है "दलित" इस लफ्ज़ को इतना ज़ोर देने की किया ज़रुरत थी। मक़सद साफ़ था दलित और मुस्लिम तसद्दुम हो जाए और ओमूमन जैसा की संघी ज़नख़ों का काम है भाग जाना या दो फ़रीक़ों में लड़ाई करवा कर खुद जंग से दूर रहना वही हो जाए।
ख़बरनामे पर चंद्रशेखर की मुस्लिम मफ़ात की बात करना हिजाब के मवाफ़ेक़त में बयान देने से ले कर तो "जय मीम जय भीम" तक सभी के ऊपर ट्रोल ने तनक़ीद करना शुरू कर दिया।
जब संघी ट्रोल और बीजेपी के कुत्ते इतना उधम मचा रहे थे तभी शक हो रहा था की दाल में कुछ काला है।यह जो दलितों से मोहब्बत दिखाई जा रही हैं और जो अंगारे भरे अलफ़ाज़ चंद्रशेखर आज़ाद, दलित मुस्लिम इत्तेहाद के ऊपर बरसाए जा रहें हैं तो बात कुछ और है। अब मसले की हक़ीक़त समझ में आ गई।
दरअसल सूबे शुमाल में साधू की जानिब से हुई इन्तेज़ामियाँ कमी और बदनज़मी को बरोज़ सनीचर एक क़तल में मुस्लिम लोगों के मुलव्विस होने को दलित मुस्लिम फसाद करवा के सूबे शुमाल के साधू को साफ़ शफ़्फ़ाफ़ निकालने की बीजेपी और संघ के ट्रोल की हिकमत थी।
कोई शक़ नहीं वोह जो मनीष के तीन क़ातिल हैं वोह भी बीजेपी या संघ से ताल्लुक़ रखते होंगे।
या वोह कॉन्ट्रैक्ट किलर होंगे।
पुलिस को पूरी तफ्तीश और जांच दुरस्त करना चाहिए।
क्योंकि बरोज़ जुमा देर रात कानपूर का हादसा हुआ और इन्तेज़ामियाँ की बदनज़मी सामने आई और बरोज़ हफ्ते सनीचर देर रात मनीष का क़त्ल हुआ।
अब मनीष के क़तल के ऊपर नाज़ेबा ट्रोल आर्मी के कमैंट्स और उन सभी कमैंट्स का लब्बो लोबाब यह निकल कर आ रहा था की मुस्लिम दलित दंगा हो जाए।
जिससे की सूबे शुमाल में साधू की पुलिस और इन्तेज़ामियाँ की पोल खुलने से मेहफ़ूज़ हो जाए।
साधू तो बड़े बड़े दावे करता है हॉस्पिटल और सेहत के बारे में बड़ी बड़ी बातें बताता है फिर उसके सूबे में जख्मियों का इलाज करने के लिए कोई जर्राह तक मौजूद नहीं था।
फौरी तिब्बी इमदाद ना मिलने के सबब कई जाने चली गई नहीं तो मरने वालों का अदद इतना नहीं होता।
अब ज़ाफ़रानी लंगूर और लँगूरनियाँ इस बदनज़मी और बदइंतज़ामी पर कब डिबेट करेगें। नाज़रीन हाथरस की वोह बच्ची याद है जिसके ऊपर ठाकुर और ब्राह्मण लौंडों ने ज़िना बिल जब्र किया था फिर उसको रातों रात बग़ैर उसके एहले खाना की इत्तेला के सूबे शुमाल की पुलिस ने उसके मज़हबी अक़ाइद के हिसाब से नहीं बल्कि घासलेट डाल कर आतिशे नार कर दिया था।
दरअसल इन सब के लिए खुद दलित समाज ज़ीम्मेदार है आज मोदी की केबिनेट में १७५ के क़रीब दलित रकूने पार्लियमान हैं अगर वोह सब एक जुट हो कर हाथ खींच ले तो फ़ौरन मोदी हुकूमत गिर सकती है।
कानपूर में ट्रेक्टर ट्राली हादसा और दिल्ली का सुन्दर नगरी क़तल दोनों हादसे एक दुसरे से मुमासरत रखतें हैं। फिर सुन्दर नगरी महज़ एक क़त्ल पर संघी, बीजेपी और कट्टरपंथी काफिरों की दलित मोहब्बत फुट फुट कर बहार आना और नाज़ेबा कलेमात के साथ इस्लाम मुस्लिम अवाम को कोसना किसी दुखती हुई रग पर हाथ रखने जैसा लग रहा था। अब वोह दुखती हुई रग समझ में आई साधू और उसकी इन्तेज़ामियाँ को मेहफ़ूज़ करना था।
सहाफ़ी जुबेर