Friday, 4 February 2022

ज़ाफ़रानी दहशत लाख बूरा चाहे तो क्या होता है……..

अज़ीज़ नाज़रीन,

सालारे मिल्लत असदुद्दीन ओवेसी पर जो ज़ाफ़रानी दहशतगर्द हमला हुआ उससे कई बातें शफ़्फ़ाफ़ हो गई।   सबसे एहम बात जैसा की जुम्मन और दिगार नोनिहाद इलज़ाम तराशी करते थे।  तमाम नोनिहादों, जुम्मानों और ज़ाफ़रानी लंगूर और लँगूरनियों की जमात का ‘बी’ टीम ‘सी’ टीम का फलसफा भी फ़ौत हो गया।   क्योंकि असद बीजेपी के लिए काम कर रहे होते तो ज़ाफ़रानी दहशतगर्द योगी और दिगार आला ओहदेदारों के होते हुए उन पर हमला क़त्तई नहीं करते।  जो मुनाफ़िक़ क़ौम के ग़द्दार असद और अकबर को क़ौम का ग़द्दार तस्सव्वुर करते थे तो उनका फ़लसफ़ा ग़लत साबित हुआ।  क्योंकि कोई भी तंज़ीम अपने ही कारिंदे और ऐसे इंसान को कभी नहीं मारेगी जो उनके लिए काम या जासूसी कर रहा हो।  वोह मुनाफ़िक़ जो अपने आपको को दुबाई का शहरी बोलता है और हर वक़्त सालार पर इलज़ाम तराशी करता है दरअसल ऐसी काली भेड़ें खुद ही बीजेपी और दहशतगर्द संघ के लिए काम करते हैं।   और मुस्लिम अवाम के दिलों दिमाग़ में शक और वास्वासा डालतें हैं।  ऐसे ही क़ौम के ग़द्दारों के लिए इस सहाफी ने अपनी नज़्मों और मज़्मूनों में नाम लिया है।  काली दाढ़ी सफ़ेद दाढ़ी।  

फिर दूसरी बात जो साबित हुई वोह यह की हमलावर हिन्दू दहशतगर्दों के तार योगी, अमित, बीजेपी और कई ज़ाफ़रानी दहशतगर्दों के साथ मुनसलिक होने की बात सामने आई है।  इस दहशतगर्दाना हमले में कई बड़े लोगों के शामिल होने के इमकान हैं।  इस हमले से यह बात भी साबित हो जाती है की सालार या मजलिस या उनके किसी भी नुमाइंदे का कहीं से कहीं तक ज़ाफ़रानी तंज़ीम या दहशतगर्दों से कोई वास्ता नहीं है।

तीसरी और सबसे एहम बात सालार और उनके छोटे भाई अकबर पर हर हाल में हक़ ताला रब्बे कायनात की ख़ास नज़र और इनायत है।  संघी दहशतगर्दों ने सालार को महात्मा गांधी समझा था।  अरे बेवक़ूफ़ों उनका और हर हक़ पसंद मुसलमान का यक़ीन  अल्लाह के ऊपर कामिल है।  और जब तक अल्लाह ने उनकी वफ़ात नहीं लिखी होगी तब तक क़ायनात का ज़र्रा भी उनको ईज़ा नहीं पहुंचा सकता। 

चौथी बात की गाज़ी जंग फतह करतें हैं ना की जामे शहादत नोश करते हैं।  हालांकि हर मोमिन की आरज़ू होती है जामे शाहादत पी कर रोज़ाये महशर में इमामे हुसैन के शाना बा शाना खड़े होने की सादात नसीब हो, जिन्होंने इन्साफ और हक़ की दिफ़ा के लिए अपने अहले ख़ाना की क़ुर्बानी दे दी।  लेकिन इंसान की आरज़ू से बढ़ कर अल्लाह अज़्ज़ वजल की माशियात होती है।  फिर गाज़ी का रूतबा भी किसी से अदना नहीं खालिद बिन वालिद की सुन्नत अदा होती है।  गाज़ी वोह जिसने हक़ का परचम ना सिर्फ बुलंद किया बल्कि हक़, इन्साफ और इंसानियत के निज़ाम को क़ायम किया। 

पांचवी बात यह की अब इस हमले से असदुद्दीन के रुतबे और मक़बूलियत में मज़ीद इज़ाफ़ा होगा।  और ज़ाफ़रानी, ज़ालिमों, संघी दहशतगर्दों का अब कुछ सच्ची नहीं लग रहा है।  यह हिमाक़त कर के इन दहशतगर्दों ने अपने ही हक़ में फजीती लिख ली है। योगी महाराज आपके संजय को अल्लाह ने वोह बसारत नहीं दी जो अल्लाह ने अपने कामिल बन्दों को दी है।  उसने तुमको वोह सब नहीं बताया जो इन ज़ाफ़रानी ज़ालिमों को भोगना है।  अभी तो बोहोत कुछ देखना पडेगा इन बीजेपी वालों को ज़ाफ़रानी ज़ालिमों को और हक़ के खिलाफ जंग करने वाले क़ातिलों को।  हालांकि मजलिस की मक़बूलियत और सालार के लिए इस सहाफी ने २०१७ से २०२० तक कई मज़मून शाया किये हैं।   अगर दहशतगर्द यह समझ बैठे हैं की बंदूक की गोलियों से वोह इन्साफ के आती हुई हवा का रुख मोड़ देंगें तो यह उनकी नासमझी है। 

नाज़रीन पढ़ते नहीं हैं यह जाहिल।  बोल कर बता कर भी वही करते हैं जो पहले बोल दिया गया है।  हमने हमारी हिंदी नज़्म में यह दुनियाँ वोह दुनियाँ। यह बात लिख दी थी। 


वहां हूरों की रेल पेल होगी, दिल की हाजत पल में पूरी होगी

७२ हूरों पर जो करतें हैं लतीफ़े, उनकी फिर ख़ूब फजीती होगी,

जहन्नुम के तमाम बाब जायेगें दिए खोल,

फिर उनकी वहां ख़ूब हजामत होगी।

 

सहाफ़ी ज़ुबेर।

 

 

महाराज जी अभी तक और सुबह क़यामत तक शैतान में इतनी क़ुव्वत और ताक़त नहीं आ सकेगी की वोह रेहमान से जंग फतह कर ले।  जब अल्लाह अपनी नाफरमानी पर शैतान को तमाम क़ुव्वत दे सकता है तो अपने फर्माबरदार वलिओं को शैतान से जीतने की ताक़त क्यों नहीं देगा।


तैयार रहो ज़ालिमों अभी तो बोहोत कुछ भोगना है बोहोत कुछ गवाना है बोहोत कुछ………..  आगे और है, और है।  और होगा वही जो होना है या जो हिन्द की तक़दीर में मालिके क़ायनात ने लिख दिया है।  हम देख सकतें हैं तुम नहीं।    


Zuber

अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...