Thursday, 9 December 2021

ज़ाफ़रानियों और उनके हामियों को अभी बोहोत कुछ देखना बाक़ी है।

 अज़ीज़ नाज़रीन,

कल बरोज़ बुध तारीख़ ८ दिसम्बर २०२१ ज़ाफ़रानी शिद्दत पसंद ज़ेहनियत का सरबराह बिपिन रावत एक हवाई हादसे में मौत की आगोश में चला गया।   वैसे कुछ दिन और तारीखें इस सहाफी के लिए काफी खुश क़िस्मत हैं और मायने रखते हैं।  उसमे एक बुध का दिन भी है।   

नाज़रीन जैसे ही बिपिन रावत की मौत की खबर आम हुई तमाम हिन्द में सियाह अबर छा गए और ज़ाफ़रानी मीडिया में तो जैसे मातम पसर गया।  जो लंगूर और लँगूरनियाँ ज़हर उगलते थे इश्तेआल अंगेज़ी में अंगार बरसाते थे वोह अब ख़ामोश नज़र आये।   नाज़रीन आज के नए भारत की और अवाम के पसमांदगी की जो हालत है उसमे ९० फीसद हाथ इन ज़ाफ़रानी लागूरों का है और १० फीसद ज़ाफ़रानी भेड़ियों का है।  हर मुद्दे पर हिन्दू मुस्लिम करना हर मुद्दे पर बजाये हुकूमत की ग़फ़लत बताने के उसको राहे रास पर लाने के मुख़ालिफ़ों से सवाल जवाब करना इश्तेआल अंगेज़ी करना हुकूमत की चापलूसी करना चाटुकारिता करना यह इन लंगूर और लँगूरनियों का शेवा बन गया था।  उसकी सज़ा भारत का अवाम भुगत रहा है।  

नाज़रीन आज जो ज़ाफ़रानी लंगूर-लँगूरनियाँ और शिद्दत पसंद, संघी बाल्टी भर भर के इज़हारे तशवीश कर रहें हैं एक साल क़ब्ल तक हर मुद्दे पर जंगी जुनूनी बस पाकिस्तान जैसे एक बली के बकरे को पकड़ कर हलाल करने की फ़िराक़ में रहते थे।   भारत में कोई भी हलचल हो उनको उसमे पाकिस्तान ही नज़र आता था।   दरअसल यह दिमाग़ी मरीज़ मुफ़लिसे दिल पाकिस्तान के कंधे पर रख कर अपना सियासी नफ़ा लेना चाहते थे।   इनको ना तो वतन से मोहब्बत है और ना ही फ़ौजिओं की हलाकत से कुछ सरोकार है।

भारत की पब्लिक तो इतनी बड़ी ग़द्दार और दोग़ली है जहाँ पाकिस्तान, मुसलमान, कश्मीर का नाम आया और जिस किसी ने भी हिन्दू शिद्दत पसंदी का मुज़ाहेरा किया के तमाम पब्लिक उसी जमात और नुमाइंदे की ग़ुलामी करने पर आमादा हो जाती है।  फिर अपने हक़ की बात कोई नहीं करता और ना ही उनको अवाम से मुनसलिक मसाइल, तकलीफ, मेहगाई, बेरोज़गारी जैसे मुद्दों पर बोलने की क़ुव्वत रह जाती है।  क्योंकि उनका ज़हन तो मुत्तसिब कर दिया जाता है, की हमें बदला लेना है।  फिर २०१४ के बाद कितने ऐसे हादसे हुए जिसको पाकिस्तान की दहशतगर्दाना हिकमत बोल कर मोदी हुकूमत ने हमदर्दी लेनी की हिकमत की है और हर मुद्दे पर जंग की गूँज सुनाई दी लेकिन अभी तक मैदान पर जंग की कोई हिकमत नहीं हुई।  मतलब समझ में आ रहा है की सब सियासी हिकमत है।  इंतेखाब से क़ब्ल कुछ फ़ौजिओं की बली लेती है मोदी हुकूमत।  फिर इंतेखाब तक पाकिस्तान और इस्लामिक जेहादिओं के खिलाफ खूब ग़ुबार रहता है।  इंतेखाब ख़तम ग़ुबार और जंग के बदल भी ख़तम।

वैसे जिस बिपिन रावत के नाम पर आज तमाम हिन्द बाल्टी भर भर आंसू बहा रहा है उसका अमल किसी फौजी सरबराह जैसा नहीं था।  बरक्स उसका अमल तो एक दहशत फैलाने वाले हिटलर जैसे सरबराह जैसा था।  फौजी सरबराह वोह जो हुकूमत को उसकी ग़फ़लत और ग़लत पालिसी पर बोले की इस हिकमत से वतन में ऐसा इन्तेशार होगा ख़ालफ़शार होगा ख़ूंरेज़ी होगी।   लेकिन जो फौजी सरबराह दरिंदे, कसाई, ज़ालिम, बाहुबली अमित शाह की ग़ुलामी करने लगे और हुकूमत के नस्ल कुशी के अमल में साथी बन जाए तो ऐसे सरबराह को फौजी सरबराह कहने से अच्छा है उसको दहशत का बग़दादी कहा जाए।  

यह बिपिन रावत ही था जिसकी क़ियादत में फौज ने कश्मीर में मासूम अवाम के खून से होली खेली थी।  हर दुसरे रोज़ ११-१२ मासूमों को आतंकी बोल कर शहीद करना फौज का पेशा बन गया था।  इतना ही नहीं इसने कश्मीर में नस्ल कुशी की हिटलर की हिकमत का आगाज़ करने की हिकमत की तैयारी की थी।  संग बाज़ (पत्थरबाज़) बोल के १७ साल के कम ऊपर के बच्चो को एक चेंबर में बंद करने की हिकमत थी।  ऐसा ही हिटलर ने किया था, तमाम यहूदिओं को दूध पिलाती माओं और उनके साथ उनकी छाती से चिपके बच्चो, जवानों को एक गैस चेंबर में बंद कर के गैस छोड़ दी थी।  अब जिस फौजी सरबराह के ज़हन में एक ख़ास जमात और मज़हब से इतनी नफरत भरी हो के वोह इंसानियत से परे हिकमत पर आमादा हो जाए तो उसकी मौत पर तशवीश सिर्फ रावण के हामी ही कर सकतें हैं।   असली राम के पैरोकार कभी भी इंसानियत के ऊपर ज़ुल्म बर्दाश्त नहीं करेगें।  हाँ जिसके ज़हन में शैतानियत होगी जो रावण का वारिस होगा वोह ऐसे ज़ालिमाना, और क़ातिलाना सोच रखता होगा और उस पर इज़हारे खुशी करेगा।

ज़ाफ़रानी हिंदुत्व को ना जाने मोदी नाम के इस शख़्स से ऐसा क्या गुमान हो गया था की सभी संघी मुसलमानों के पैगम्बर, किताब यहाँ तक की अल्लाह की शान में भी बदकलामी करने लगे।   मज़ाक़, मखौल बनाने अलगे अल्लाह एक हवा है फिर उनको क्या लगता था मोदी की शैतानी क़ुव्वत और ताक़त तो अल्लाह से भी क़वी है मोदी कुछ भी कर सकता है।  लेकिन वोह तमाम ज़ाफ़रानी यह भूल गए की शैतान को भी क़ुव्वत अल्लाह ने ही अता की है और जब चाहे वोह उससे सब कुछ छीन सकता है।  अब जिस मोदी के ऊपर यह ज़ाफ़रानी पोगाते थे वोह खुद ही इतना लागिर और कमज़ोर हो गया है की अपने हाथों से खाना तक नहीं खा सकता उसको खिलाने के लिए एक अर्दली की ज़रुरत होती है। 

यह ज़ाफ़रानी लंगूर-लँगूरनियाँ अपनी फौज पर पूर एतेमाद थे तकब्बुर और ग़ुरूर का वोह आलम था की पाकिस्तानी नुमाइंदों को अपने मुबाइसे में मदू करना और फिर उनकी फौजी हिकमत पर उनका मखौल उड़ाना और अपनी फौजी क़ुव्वत को आला बोलना।  पुलवामा के हादसे के बाद आज तक टीवी न्यूज़ ने इमरान खान के ऊपर एक तन्ज़िया वीडियो शूट किया था जिसमे उनका मज़ाक़ बनाया था की वोह कुर्सी पर बैठे हैं और अज़हर मसूद उनकी कुर्सी के नीचे से कभी दाएं बाज़ू से कभी बाए बाज़ू से  निकल आतें हैं।   उनका सर इमरान खान बार बार नीचे करते हैं।  फिर उस वीडियो में इमरान बोलतें हैं भारत हमें सबूत फ़राहम करे की पुलवामा में हमारा हाथ है हम कारवाही करेगें।   और मोदी को एक कद्दावर रावण की ताक़त वाला बंदा जो मुँह और ५६ इंची सीना फूला कर इमरान को देखता है ऐसा दिखाया था। 

यह तमाम ज़ाफ़रानी माज़ी की तमाम तारीख को भूल गए होंगे तभी ऐसी हिमाक़त पर आमादा हुए।  इनको इस बात का इल्म नहीं होगा की शैतानी ताक़त कितनी ही क़वी और ताक़तवर हो जाए रहती आखिरकार रेहमान के ताबे ही है। जब चाहे रहमानी ताक़त ऐसे शैतानों को मटियामेल कर सकती है धुल चटा सकती है तबाह कर सकती है फ़ना कर सकती है।  और वही भारत के साथ हुआ और आगे भी होगा।     

Zuber

अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

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