अज़ीज़
नाज़रीन,
आज का मज़मून एक हक़ीक़ी किस्से को मुसन्निफ़ ने अपने अलफ़ाज़ की चाशनी, ख़यालात के दरिया में भिगो कर पेश किया है। आपसे गुज़ारिश है पूरी कहानी का मुताला करें और हतमी राये दें।कहानी का एक हिस्सा मुक्कम्मल हो चूका है जबकी मुहाफ़िज़ की मौत और पंडित जी का उसको समझ पाने का पछतावा मुस्तक़बिल का हिस्सा है.
इस मोहब्बत के हक़ीक़ी कहानी का आगाज़ भारतीय सूबे के एक अज़ीम शहर से होता है। उस शहर में एक पंडित जी ज़माने की ठोकरे खाये साताये गए तकलीफें दिए गए किसी मंदिर में पनाह लेते हैं। मंदिर की इन्तेज़ामियाँ उनको मंदिर के कामों के लिए और ठाकुर जी की खिदमात को अंजाम देने के लिए रख लेती है। पंडित जी के मज़हबी चोले से अतराफ़ के अवाम, ख़ास मंदिर की इन्तेज़ामियाँ और आने जाने वाले ज़ायरीन खासे मुत्तासिर थे। लेकिन इन सब से अलहदा एक शख़्स जो पंडित जी के मज़हबी चोले और अपने मज़हब की अवाम के लिए तड़प, शिद्दत से ख़ासा मुत्तासिर हुआ वोह मंदिर की इन्तेज़ामियाँ का हिस्सा था, वोह पंडित जी का मुहाफ़िज़ (Protector) बन बैठा। उसने अज़्म किया की पंडित जी को मंदिर के अंदर और बहार हर क़िस्म के फितना अंगेज़ अनासिरों से मेहफ़ूज़ करना है। उसने पंडित जी के आस पास हिफ़ाज़ती इक़दाम बड़ा दिए और iron dome के जैसे उसकी हिफाज़त करने लगा। पंडित जी का मानना था की मंदिर इंसान का दूसरा घर होता है. पंडित जी की ऐसी बातें मुहाफ़िज़ के दिल को छूने लगी.
मंदिर के अंदर इन्तेज़ामियाँ और ख़ास मुहाफ़िज़ की हिफ़ाज़ती इक़दाम देख कर पंडित जी गुरूर और तकब्बुर से हर चीज़ को देखने लगे। मुहाफ़िज़ हर काम को पंडित जी की इजाज़त ले कर करने लगा, इसको पंडित जी ने समझा की यह मुहाफ़िज़ तो गुलाम है इसको जिस अंदाज़ में हकाला जाएगा और हुकुम दिया जाएगा वोह मेरा हुकुम सरे तस्लीम मानेगा। लेकिन मुहाफ़िज़ जानता था की शर पसंद अनासिर पंडित जी को नुकसान पंहुचा सकते थे, मुहाफ़िज़ अपना काम ईमानदारी से और पंडित की हिफ़ज़ाती इक़दाम को सर अंजाम देता रहा। पंडित जी की शख्सियत, उनके मज़हबी चोले ने मुहाफ़िज़ को ख़ासा मुत्तासिर किया।
वोह मुहाफ़िज़ पंडित जी का अपने मज़हबी लोगों के लिए तड़प, जूनून और उनके मज़हबी चोले की वजह से उनसे इश्क़ करने लगा. मुहाफ़िज़ ने पंडित जी के मंदिर के आने जाने वाले रस्ते में खुफियां हिफ़ाज़ती मुहाफ़िज़ तैनात कर दिए जिससे की पंडित जी को ज़रुरत के वक़्त फौरी मदद फ़राहम की जा सके. पंडित जी के उस इश्क़ में मुहाफ़िज़ का मक़सद उनको हर क़िस्म की शर अंगेज़ अनासिरों से मेहफ़ूज़ करना था. लेकिन पंडित जी ने मुहाफ़िज़ के जज़्बात, एहसासात को एक झटके में कुचल कर रख दिया। यह बोल कर की में अकेले काम करने में ज़्यादा यक़ीन रखता हूँ, मुझे किसी की मदद लेना पसंद नहीं।
मुहाफ़िज़ के इश्क़ को देख कर पंडित बेहद मग़रूर और तककब्बुर से लबरेज़ हो गए. अब जब कभी भी मंदिर में मौजूद पंडित को मुहाफ़िज़ का पैग़ाम आता तो वोह उसको नज़र अंदाज़ करने लगे. कभी कभी गुस्से से उस मुहाफ़िज़ को ज़लालत भरे अंदाज़ में जवाब देने लगे. अभी में पूजा में मसरूफ हूँ में अपने उस्ताद (गुरू) की बातें सून रहा हूँ मुझे अज़ीयत मत दो, वग़ैरा.
पंडित जी को ना जाने यह वहम कहाँ से हो गया था की protector एक अदना हक़ीर इंसान है उसको जितनी अज़ीयत, तकलीफ़ दी जाएगी वोह सब बर्दाश्त करता रहेगा। मुहाफ़िज़ एक आला तालीमी आफ़ता, तहक़ीक़ाती इदारों से मुनसलिक दीगर उलूम का माहिर था. उसको हर वक़्त इस बात का खदशा रहता था की पंडित जी को कोई नावाक़िफ़ अनासिर इज़ा ना पंहुचा दें. उस बात का ज़िक्र कई दफ़ा मुहाफ़िज़ ने पंडित जी से भी किया था.
नाज़रीन यह कहानी महज़ मुसन्निफ़ की अलफ़ाज़ की अदाएगी नहीं है बल्कि हक़ीक़ी पाक़ीज़ा मोहब्बत पर मब्नी है. एक हिस्सा मुक्कम्मल हो चूका है अगली क़िस्त में मुहाफ़िज़ (Protector) की मौत के हाल बयान होंगे। जिसका ज़िक्र मुहाफ़िज़ पंडित जी से कर चूका है, की उसकी जान को ख़तरा है. नावाक़िफ़ अनासिर उसको मौत दे सकतें हैं, या उसकी एक्सीडेंट या किसी और वजह से मौत वाक़े हो सकती है. फिलहाल मुहाफ़िज़ ज़िंदा है. अब पंडित जी पर यह लागू होता है की वोह उनके मुहाफ़िज़ (protector, Iron dome) के हक़ में मंदिर में दुआ करें।
अगले
हिस्से में नाज़रीन खुद बताये की वोह पंडित कौन है और मुहाफ़िज़ कौन. और इस कहानी में
ग़लती किस की थी, पंडित की या मुहाफ़िज़ की जो किसी भी इंसान के मज़हबी चोले से मुत्तासिर
हो कर उसको अपना सब कुछ समझ बैठा। क्या पंडित
जी मुहाफ़िज़ को समझ पायेगें। या मुहाफ़िज़ को
मरना ही पडेगा।
अब अगली कड़ी में.......