अज़ीज़ नाज़रीन,
आज ख़ाकसार इश्क़े हक़ीक़ी और इश्क़े मजाज़ी के फलसफे
को ले कर अलग ही कैफियत में मज़मून शाया कर रहा है. नाज़रीन तस्सवुफ़ में माशूक़ से
मुराद पीरो तरीक़त, रसूले अरबी बिल आख़िर बारी इलाहा से होता
है. यह मोहब्बत के दर्जे होतें हैं. इश्क़े हक़ीक़ी की पहली सीढ़ी इश्क़े मजाज़ी होता है. या इश्क़े हक़ीक़ी की इब्तेदाह ही इश्क़े मजाज़ी से होती है. एक नमाज़ी परेहज़गार बा शरा, बा किरदार इंसान अगर मोहब्बत और इश्क़ में पड़
गया तो अब आगाज़ होता है उसके इम्तेहान का. यहाँ पर शदीद जंग होती है, शैतान और
उस इंसान के किरदार के दरमियान। यहाँ पर वोह शख़्स तीन जानिब से जंग
लड़ रहा होता है. पहली अपने नफ़्स के साथ, दूजी
शैतान के साथ और तीजी माशूक़ (मोहतरमा ख़ातून, दुनियाँ) के साथ. पहली
सीढ़ी जो आसान नहीं होती और हर बार आशिक़ को शैतानी हर्बे, शैतानी वस्वसे, शैतानी शर से दो चार होना पड़ता है. फिर
भी अगर किसी सूरत वोह आशिक़ पहली सीढ़ी चढ़ गया, और अपने मश्क़ को बरक़रार रखा तो वोह इश्क़े हक़ीक़ी
और मार्फ़त की नेमतों से लुत्फ़ अन्दोज़ होता है। होता, यही है इश्क़े हक़ीक़ी को पाने की चाहत रखने वाले अक्सर और
बेश्तर इंसान इश्क़े मजाज़ी के सफर में शैतान
के शिकार हो कर दम तोड़ देतें हैं. मोहब्बत में धोका होने के सबब शराब ख़ोरी और तारीकी
के अंधेरों में ग़र्क़ाब हो जातें हैं. और अल्लाह की मार्फ़त हासिल नहीं कर पाते, अल्लाह की मोहब्बत से दूर हो जातें हैं. कभी आशिक़ शिकवा कर बैठता है. मेने तेरी इतनी इबादत की मुझे मेरी माशूक़ नहीं मिली। या जिसे चाहा उससे शादी नहीं हुई वग़ैरा। इबादत और मोहब्बत बेलौस होना चाहिए। अगर उसका बदला माँगा तो वोह तिजारत हो गई.
जब शख़्स इश्क़ मज़ाज़ी के इस मरहले (आग के दरिया) को
पार कर जाता है और दुनयावी लज़्ज़त्तों से ग़ाफ़िल नहीं होता तो उसको हासिल होती है
अल्लाह की मार्फ़त और रूहानियत। उस शख़्स को शैतान, नफ़्स और दुनिया से जंग जीतने पर
बारी इलाहा की बारगाहे खुदावंदी से हासिल होते हैं इनामात, दरजात बुलंद
होतें हैं फिर ऐसे शख़्स को मुजाहिद और ग़ाज़ी कहने में
कोई हर्ज नहीं।
नाज़रीन अब ऐसा शख़्स जो दुनयावी लज़्ज़तों और
माशूक़ (मोहतरमा ख़ातून, दुनियाँ) की चाहत से बालातर हो, फिर उसको हर जानिब अपना मेहबूब ही नज़र आता है. लेकिन अब मेहबूब और माशूक़ की सिफ़त तब्दील हो चुकी
है. अब वोह माशूक़ या मेहबूब की बात करता है तो उसका मतलब अपने मुर्शिद, रसूले अरबी या बारी इलाहा से होता है.
हो सकता है वोह कैफ़ियत दीवानगी के आलम में जो कह दे वही बातें अब
सच्ची और दुरुस्त साबित हों. फिर ऐसा शख़्स आगे के
हालात बयान करना शुरू कर देता है. दुनियां उसको पागल
दीवाना समझती है. उसकी चाहत (मोहतरमा ख़ातून) अब उसको फरामोश और नज़र अंदाज़ करना शुरू कर देती है.
लेकिन अगर उस शख़्स ने तमाम अज़ीयतों और बावजूद
तकलीफों के अपने हक़ीक़ी प्रियतम माशूक़ (मुर्शिद, रसूले अरबी,
बारी इलाहा) का दामन नहीं छोड़ा तो ऐसा
मजनूँ पागल दीवाना अल्लाह के बोहोत नज़दीक होता है.
और ऐसे मजनूँ दीवाने की अगर कोई दिल शिकनी करता है तो उसका कफ़्फ़ारा
और हिसाब अल्लाह उस ज़ालिम और सितमगर से लेता है.
वैसे तो मोहब्बत का नाम ही क़ुर्बानी और
इम्तेहान देना है, हर
मोहब्बत क़ुर्बानी भी मांगती है और इम्तेहान भी लेती है. ख़्वाह वोह इश्क़े मजाज़ी हो या हक़ीक़ी इश्क़ क़ुर्बानी तलब करता है, इम्तेहान लेता है.
माशूक़ (मोहतरमा ख़ातून, मुर्शिद, नबी
सल्लम और अल्लाह) की राह में आशिक़ क्या क्या क़ुर्बान कर
सकता है. अगर आशिक़ अपने इम्तेहान में कामयाब हुआ तो उसके ऊपर इश्क़े हक़ीक़ी में दरजात बुलंद होतें
हैं मार्फ़त मिलती है इनाम मिलते हैं और मजाज़ी में
माशूक़. बोहोत से कम इल्म और नो उम्र किसी भी दीवाने को
झिड़क देतें हैं उसकी दिल शिकनी करते हैं. मुझसे किसी
क़िस्म की उम्मीद मत रखना। यह
ग़लत सोच है, सच्चा आशिक़ बे लोस मोहब्बत करता है जो सिर्फ
क़ुर्बानी देता है ना की लेता है. वोह ख़ुद तपिश बर्दाश्त करता है जलता है लेकिन माशूक़ को ख़ुशी फ़राहम करने की तदबीर करता है. उसको अपने माशूक़ से
कोई उम्मीद ना होती है वोह तो दीदार का दीवाना होता है. उसको दीदारे यार की तड़प होती है.
जिस महफ़िल में उसका माशूक़ नहीं वोह महफ़िल उसको सूनी लगती है.
दौरे हाजरा में जब इंसान ताजिर और दुनयावी लज़्ज़त
के पीछे भाग रहा है हर क़िस्म के अमल में उसको नफ़ा और नुक़सान देखने
की आदत हो गयी है. इस काम से मेरे मुस्तक़बिल पर क्या असर होगा, मेरे को
ऐसा करने से क्या क्या फायदा मिलेगा। अगर कोई इबादत भी करेगें तो बारी इलाह से
उम्मीद के इसके बदले में हमको जन्नत मिलेगी। या
दुआ में अपनी
चाहत को पाने ले लिए नए नए ऑफर. मेरी चाहत फलां बिन फलां है तू उससे मेरा रिश्ता करवा दे
तो में यह गुनाह करना छोड़ दूंगा। यह तो खुली तिजारत है.
बेलौस मोहब्बत करने वाले नमाज़ क़ायम करतें हैं
या कोई भी नेकी का अमल करते वक़्त कभी भी एक्सचेंज ऑफर नहीं रखते। बस माशूक़ ने जो कह दिया वोह करना है. और रब से मांगते वक़्त जो तेरी मर्ज़ी हो वोह हम को दे दे. ऐसे बन्दे अल्लाह की जानिब से दी जाने वाली अज़ीयत पर भी
सरे तस्लीम ख़म होतें हैं. बिल फ़र्ज़ अगर उनके तमाम नेक आमाल पर अल्लाह
रोज़ाये जज़ा पर उनको सज़ा देगा तो क्या वोह शिकवा करेंगें। नहीं। क्योंकि वही सच्चे आशिक़ हैं. और अल्लाह की मर्ज़ी में अपनी मर्ज़ी ज़म कर देंगें जो आपकी मर्ज़ी। हमें
मंज़ूर है. जहन्नुम भी तो आप ही की मर्ज़ी से दी जा रही है.
नाज़रीन ख़ाकसार ने एकम जुलाई २०२१ को अपने whats aap पर एक पैग़ाम आम किया था जिसका मफ़ूम था की अगर आप मेरी जंगे इन्साफ से मुतमईन नहीं हैं तो आप बेशक मुझको डिलीट और ब्लॉक कर दें. इस पैग़ामें आम के बाद ज़्यादातर अफ़राद जिसमे खातूनों की जमात का कमो बेश ५० फीसद हिस्सा है सभी ने यही कहा. नहीं ना हम आपको ब्लॉक करेंगे और ना ही डिलीट करेंगें। आप एक नेक सिफ़त हक़ गोई की बात करने वाले शफ़्फ़ाफ़ किरदार के इंसान हैं. एक ने कहा में आपकी हर नज़म, मेसेज और लेख पड़ती हूँ, में आपको डिलीट नहीं करूंगी. एक ने कहा जुबेर साहब इतना ख़फ़ा क्यों हो मेने आपको कुछ कहा, अगर करना ही होता तो कब का कर दिया होता।
नाज़रीन बताने का मक़सद वही है, जो बे लोस इश्क़ करते हैं उनको किसी क़िस्म की कोई हाजत या उम्मीद किसी भी शख्स से नहीं होती है. वोह एहले नास के लिए काम करतें हैं. जो लोग दीवानगी की हद को पार कर जातें हैं फिर उनको दुनयावी जमात से कोई हाजत ही नहीं रह जाती है. उनको तो सब कुछ पहले ही उनके हक़ीक़ी माशूक़ (रब) से मिल गया होता है.
ऐसे लोग जिनको पहले ही सब कुछ अता कर दिया होता
है वोह एहले नास की फलाह के लिए काम करतें हैं. अपने अतराफ़ में पहचान
वालों में परेशान कून अफ़राद की परेशानी को
दूर करतें हैं. उनके बेहतर मुस्तक़बिल के लिए दुआ गो रहतें हैं. ऐसे
लोग वोह चिराग़ होतें हैं जो खुद जल कर दूसरों को रोशन करतें हैं. और
किसी को कानों कान खबर नहीं होती की इस रौशनी की इब्तेदाह या मरकज़ कौन हैं. जब
तलाश शुरू होती है तो इस बात का इल्म होता है इसकी रौशनी का मरकज़ यहाँ है. एक तारीख़ी हक़ीक़ी क़िस्से से अपने मज़मून का खात्मा करूंगा।
हज़रत अबू हनीफा रेहमतुल्लाह वली कामिल और इस्लाम
के ४ सतूनों में से एक थे. आपकी ख़ानक़ाह में अक्सर अवाम अपने मसले और मसाइल के लिए
आते रहते थे. एक बार उनके दरमियान कुछ मुरीदीन बैठे थे और
कुछ साईल जो अपने मसले ले कर आये थे. सब को काहवा पेश करने का हुकुम दिया गया. क़हवा
ले कर दूकान से एक कम उम्र बच्चा आया जिसने सबसे पहले एक दस्तरख़ान लगाया
और बड़ी
ही नफासत तमीज़ से तमाम अफ़राद को क़हवा पेश किया। हज़रत
को उसका अंदाज़े अमल काफ़ी पसंद आया और बड़े मुत्तासिर हुए. उन्होंने
उसको दुगुनी तन्खा देने के वादे पर अपने यहाँ रख लिया, और कहा जब
कुछ काम ना हो तुम पड़ा करो और जब भी कोई मेहमान आये तो इसी अंदाज़ में कहवा पेश
किया करो। उसकी वालेदा को पता पड़ा तो हज़रत से ख़फ़ा हो
कर अपने बेटे को फिर उस ही क़हवा वाले के यहाँ लगा दिया। फिर
कुछ अर्से बाद वही मामला हुआ और हज़रत ने उसको फिर दो गुनी तन्खा पर अपने यहाँ रख
लिया। लेकिन
इस बार उसकी वालेदा ना सिर्फ ख़फ़ा हुई बल्कि हज़रत को नाज़ेबा कलेमात भी बोले। आप मेरे बच्चे की ज़िन्दगी बर्बाद कर दोगे। आप जैसे मौलाना की सोहबत में रह कर क्या करेगा, इसका क्या मुस्तक़बिल होगा यह तो बर्बाद हो जाएगा। कम से कम क़हवा वाले के यहाँ रहेगा तो कुछ सीखेगा और आगे उसकी तिजारत में हिस्सेदार भो हो सकता है. उस पर हज़रत ने बोला, हमारे यहाँ रहेगा तो इसको
हर रोज़ वोह
ख़ाना मिला करेगा जो हाकिमे वक़त (बादशाह) को हफ्ते में एक रोज़ मिलता है. बात
आई गई हुई. हज़रत की सोहबत में रह कर उनकी दानिशमंदी और
रूहानी फेज़ से उसने बोहोत कुछ सीखा। कुछ अर्से बाद हज़रत का विसाल हो गया और
वोह मुफ़्ती का इम्तेहान पास करने में कामयाब हुआ.
फिर वक़्त के ख़लीफ़ा या हाकिम के यहाँ
मुफ्ती की मुलाज़मत मिली। उसको मुलाज़मत की सनद और दिगार मराआत से नवाज़ने
के लिए ख़ुद हाकिमे वक़्त आये और उन्होंने उनको उनकी तन्खा के साथ साथ कहा आपको हर
रोज़ ख़ाने में चिलगोज़े, बादाम, पिस्ते और तमाम सूखे मेवे दिए जायेगें। जो हमको
हफ्ते में एक बार यानी जुमे को मिलते हैं. बादशाह की बात सून कर मुफ्ती साहब रोने लगे. बादशाह
ने पुछा हमारे इनाम और तन्खा क्या आपको कम लगी. उस पर उन्होंने बोला नहीं आज मुझे
मेरे मुर्शिद याद आ गए. उन्होंने बरसों पहले बोला था
की इसको वोह ख़ाना हर रोज़ मिलेगा जो बादशाहे वक़्त को हफ्ते में मिलता
है. उनकी
बात सच्ची साबित हुई इसलिए खुशी से अश्क़ निकल पड़े.
नाज़रीन बताने का मक़सद वही है हज़रत अबू हनीफा
की मोहब्बत उस बच्चे के लिए बेलौस थी, ना ही उनको उस से कोई उम्मीद थी. लेकिन वोह काफ़ी आगे का देख रहे थे उसका मुस्तक़बिल उस क़हवा वाले के
यहाँ बर्बाद होगा लेकिन मेरे यहाँ रहने से आबाद है. जबकी उसकी वालेदा नज़दीकी रूपये पैसे को देख रही
थी. और
हुआ वही जो रब ने उस बच्चे की तक़दीर में लिख दिया था. शैतान
ने लाख़ कोशिश की हर्बे खेले लेकिन वोह उन्ही के यहाँ रहा क्योंकि उसके दरजात
बुलंद होना थे.
दुआ करो नबी के सदक़े जिस तरह उस क़हवा वाले की दूकान पर अपनी ज़िन्दगी बर्बाद करने वाले बच्चे को अबू हनीफा जैसे दानिशमंद, दूरंदेश, आलिम की सोहबत मिली उसी तरह हर मोमिन हर मोमिना हर मुस्लिम हर मुसलमा, हर हक़ की तलाश से ग़ाफ़िल और भटके हुए इंसान को हक़ का रेहबर मिले।
Zuber