Saturday, 23 January 2021

मुस्लिम मजलिस पाक है: असद, अकबर, आज़म क़ौम के सच्चे रहबर।

अज़ीज़ नाज़रीन,

इन संघी दहशतगर्दों, शिद्दत पसंद काफिरों, बीजेपी वालों, मुनाफ़िक़ों, नो निहाद सेकुलरों और मीडिया के ज़ाफ़रानी लंगूर और लँगूरनियों को असदउद्दीन (शेर) और उनकी तंज़ीम मुस्लिम मजलिस इत्तेहाद का इस क़दर ख़ौफ़ तारी हो चूका है की कही भी किसी भी मुद्दे पर मुनाफ़ेक़त की बात आई या किसी सहाफी ने मस्लेहतन इशारों किनायों में अपना मज़मून लिखा के लग गए सभी उसका रूख़ असदउद्दीन और उनकी तंज़ीम मुस्लिम इत्तेहाद की जानिब मोड़ कर अवाम के ज़हन में शक, शुकूक और वस्वसे डालने।  

 

असद के बढ़ते हुए क़द और दबदबे से सभी बे पनाह ख़ौफ़ ज़दा हैं, क्या इक़्तेदार वाली हुकुमरान जमात और क्या मुख़ालिफ़ तंज़ीमें।   अभी हाल ही में ०६ जनवरी २०२१ को इस सहाफी ने एक मज़मून काफ़िरों को मौत देने के बाद क़ौम के गद्दारों की बारी है. लिखा था।   अब मसले को समझे बिना मज़मून किस की जानिब इशारा कर रहा है उसको जाने बिना जाहिल, कम अक़ल, गधे, साधू, दहशतगर्द सभी लग गए एक सूर से सूर मिलाने।  कुछ अहमक़, जाहिलों ने तो यहाँ तक कह दिया की असदउद्दीन की पार्टी की वजह से ही हम इक़्तेदार में मौजूद हैं, उनकी ताक़त और मदद की वजह से ही हम जीतते हैं,  आगे भी वोह हमारी जीत में मदद करेगें।   उस जाहिल की बात से यह ज़ाहिर हो गया की उसकी तंज़ीम में कोई भी ऐसा मर्द नहीं और ना ही किसी में इतनी क़ुव्वत और ताक़त है की वोह अपने बल बूते पर अपनी तंज़ीम को जीत दिलवा सके।  इससे क़ब्ल एक और जाहिल दहशतगर्द बोला था, इलाक़ा तेरा धमाका मेरा, दूसरा बोला था हैदराबाद में सर्जिकल स्ट्राइक करेगें।   

अब जिस तंज़ीम में इतनी ताक़त नहीं और जिसमे एक भी ऐसा मर्द नहीं जो अपनी तंज़ीम को अपने बल पर जीतवा सके बरक्स अपनी तंज़ीम को दुसरे ताक़तवर और क़ुव्वत वाले मर्द के पास भेज कर उसके बल बूते पर विकास पैदा करने की आरज़ू रखतें हों तो ऐसी तंज़ीम आपको क्या दे सकेगी जो अपने खुद के विकास के लिए कभी पाकिस्तान, कभी मुस्लिम, कभी असदुद्दीन, कभी लव जिहाद, कभी बाबरी कभी मुग़ल कभी अकबर कभी हिन्दू अक़लियत हो जायेगें ऐसी बातों पर डिपेंड हो।  नामर्द।  इतना ही नहीं इक़्तेदार और जीत के लिए यह लोग अवाम, फौज, जमहूरियत सबका क़त्ले आम कर डालतें हैं जिसका ज़िक्र कई एक मज़मूनों में किया जा चूका है।  दहशतगर्दाना बम धमाकों से ले कर तो दंगों तक तमाम हदों तक गिर जातें हैं।     

इन लोगों के इस तरह के बायानात और दूसरों पर तोहमत लगा कर अपनी जीत का तस्सव्वुर करना ही यह साबित करता है जिस तरह मरी हुई गाये बैल के गोश्त पर चील कव्वों, गिद्धों और गीदडों की तरह नज़रे होती हैं वही किरदार इनका होता है।   शेर वोह जो अपना शिकार खुद करे ना ही किसी और के भरोसे पर ज़िंदा रहे, और ना ही मुर्दार मरी हुई गाये बैल को खाये।     

नाज़रीन असदुद्दीन और उनकी तंज़ीम मुस्लिम इत्तेहाद की मजलिस से वोह तमाम अफ़राद ख़ौफ़ ज़दा हैं जिनका कुछ ना कुछ खराब होते दिख रहा है।   और वही इलज़ाम तराशी कर रहे हैं असदुद्दीन संघी हैं, मुनाफ़िक़ हैं, मुस्लिम क़ौम के ग़द्दार हैं, मुस्लिम क़ौम की हक़तल्फ़ी करने वाले, मजलिस बी टीम सी टीम वोट कटुआ। 

दर हक़ीक़त यह उनका हद दर्जे का ख़ौफ़ है जो ज़बान पर चढ़ कर बोल रहा है।  यह लोग सोचते होंगे अगर इस शख्स के ख़िलाफ़ बदगुमानी नहीं फैलाई गई तो हमारा वोट बैंक खिसक जाएगा, हमारा यह मफ़ात फेल हो जाएगा, हमें इस जगह नुकसान उठाना पड़ सकता है वग़ैरा।  

आज एक साल से ज़ाइद आज़म ख़ान सियासी नफरत, बदला और हसद के चलते बग़ैर किसी जुर्म के जेल में क़ैद हैं लेकिन ना ही सपा पार्टी के किसी भी ओहदेदार को और ना है सपा के रहबर अखिलेश यादव को उनकी याद आई जबकी आज़म ख़ान ने मुलायम सिंह यादव और सापा के लिए बैलगाड़ी में इन्तेख़ाबी मरहले को मुकम्मल किया था लेकिन आज उनको तनहे तनहा छोड़ दिया और यही बात मेने अपने मज़मूनों में की है।  जब भी बात कुफ्र मुक़ाबिल मुस्लिम आ जाएगी आपको अपना सबसे बड़ा हमदर्द कहलाने वाले भी आपका साथ छोड़ देंगें।   

अब जब असद उद्दीन ओवेसी ने आज़म ख़ान से मिलने के लिए उनका वक़्त माँगा तो तमाम सियासी तंज़ीमें दौड़ने लगी और उनके क़ल्ब की दर्जे हरारत तेज़ हो गई।   अब सपा भी मिलने पहुंची, कांग्रेस भी अपने नुमाइंदों इमरान को ले कर खीर पकाने पहुंची अब सपा धरना देने की बात कर रही है चक्का जाम करने की बात करती है।  मौलाना जोहर अली यूनिवर्सिटी की ज़मीन एक ज़ाफ़रानी दहशतगर्द (साधू) को सोप दी गई लेकिन इन सपाइयों की नींद नहीं खुली और असद ने मिलने का वक़्त माँगा फ़ौरन नींद से बेदार हो गए।  फिर आगे अब दूध और चाशनी टपकायेगे यह नो निहाद सेक्युलर, तो अभी तक कहाँ थे, आज़ाम साहब को एक साल से ज़ाइद सियासी बुग्ज़, और हसद की वजह से जेल कर रखी है और आप असद के पहुंचते ही नींद से बेदार हो गए।  क्या यह दोग़ला रवैया नहीं है। 

यह बात महज़ सियसत तक महदूत नहीं है जिसका ज़िक्र मेने अपने कई मज़मूनों में किया है, बल्कि हाउसिंग सोसाइटी से ले कर ऑफिस में काम करने तक हर अफ़राद ने इस ज़हर को पीया होगा।  ऑफिस में जो आपके अहबाब और सबसे क़रीबी दोस्त होंगे हर मुद्दे पर आपके शाना बा शाना खड़े होतें होंगे अगर आपके और एम्प्लायर के दरमियान कुछ कशीदगी हो गई भले ही आप हक़ पर होंगे लेकिन आपके तमाम अहबाब आपको तनहे तनहा छोड़ कर एम्प्लायर की ना इंसाफ़ी, हक़तल्फ़ी को ही दुरुस्त बतायेगें।   जबकि अक्सरियत तबक़े के साथ ऐसा कुछ होगा तो तमाम एक सूर से सूर मिला कर उसको हक़ दिलवाने की बात करेंगें।    

अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...