Wednesday, 6 January 2021

काफ़िरों को मौत देने के बाद क़ौम के गद्दारों की बारी है.

अज़ीज़ नाज़रीन,

आज के दौर कुफ्रिया मे हिन्द के जो हालात हैं वह कोई नई बात नही हैबल्कि हर दौर मे हक़ और बतिल की जंग मे शैतान के हमराह वही होतें हैं जो झूठे, फरेबी, जालसाज़, धोकेबाज़ और ना इंसाफ़ होतें हैंनाज़रीन आप को यह जान कर बेहद मुसर्रत होगी की हर ज़ालिम को दिफाई फौजी उसके अंजाम तक भेज रहें हैं. अभी तो २०१४ से २०१९ का बदला मुकम्मल नहीं हुआ है फिर २०१९ से आगे इससे ज़्यादा भयानक और खौफ़नाक़ अंजाम तक भेजे जायेंगे हर काफिर शिद्दत पसंद हर सघी हर भाजपा वाला और हर मुनाफ़िक़.

नाज़रीन जैसे की हिंद की तक़दीर मे तारिकी ओर तबाही लिखी जा चुकी है वैसे ही नया साल काफ़िरों के लिये सख़्त दिन ले कर आया हैमौतों का सिलसिला जो एकम जनवरी से शुरू हुआ है बदस्तूर जारी है. चाहे वह हरियाणा के मंदर के अंदर घूस के शातिर साधू की गर्दन क़लम करने का मामला हो या शमशान घाट पर मौजूद २५ काफ़िरों को मौत के घाट उतार कर जहन्नुम रसीद कारने का मामला या बुलंद शहर की उस ज़ेहरिली नागिन कांस्टेबल को दीफाई फौजों द्वारा फ़ासी पर लटकाने का मामला हो जो एंटी रोमियों यूनिट की सरबरह थी और मुस्लिम नवजवानों को परेशान करती रेहती थीसुब बजे उस ज़ेहरिली नागिन को इस जिहादी की सर परस्ती मे फ़ासी दे दी गई.

नाज़रीन साधु ने शमशान के नाम पर क़ियादत हासिल की थी और आतंकी ने बोला भी शमशान के बारे मे था सो वही अवाम को मिला.

बदला अभी तो बोहोत बाक़ी है, ज़ेहरिली नागिन को फासी देने के बाद उन अफ़राद की फ़ासी याद गई जिनको २० मार्च २०२० को फ़ासी पर लटकाया गया था और मक़बूल भट्ट, अफज़ल गुरू, याकूब मेमन और मुजाहिद मोहम्मद अजमल आमिर कसाब का क़िसास  पूरा हुआ था.

हज़रात इतना सब करने  के बाद भी तनक़ीद करने वाले अपनी मुनफक़त से बाज़ नहीं आते हैंऐसे लोग हर हाल मे जनखा पार्टी और मुनाफ़िक़ों के गिरोह से हैं. ऐसे अफराद सख़्त तरीन अलफ़ाज़ में मज़म्मत और तल्ख़ बयानी से इस सहाफी के जज़्बे को कमज़ोर कर के उसको ज़ेहनी शाकिस्त देना चाहतें हैंबोहोत से संघी दहशतगर्द अपना मुस्लिम नाम रख कर बे बुनयाद हदीसें बयान करतें हैं. कुछ का कहना होता है तुझको इतना शौक़ है जिहाद का तो तू कर हमें और हमारे बच्चों को क्यों घसीट रहा हैज़रा जा कर जंग  मैदान में लड़ फिर तुझको पता पड़ेगा की कैसे तेरे को मौत आती हैउन तमाम मुनाफ़िक़ों और मुस्लिम नाम रखे  संघी, बीजेपी वालों को बता देना चाहता हूँ, की में तो जिहाद कर ही रहा हूँ और रहा सवाल मैदान में जाने का तो जंग में हर इंसान का एक काम मुताय्यन होता है. जो जंगजू होतें हैं वोह जंग की कमान संभालते हैं लेकिन पीछे जितने अफ़राद उस जंग में हिस्सा लेते हैं सभी फौजी तस्सव्वुर किये जातें हैंजैसे तबीब ज़ख़्मी अफ़राद की देख भाल करतें हैं उनको अपनी जान से ज़्यादा तिब्बी सहूलियत फ़राहम करतें हैं. उसी तरह पानी खाने का एहतेमाम करने वाले जंग के लिए असलाह और जंगी  साज सामान तैयार करने वाले फिर पड़े लिखे अफ़राद जो मुजाहिदों की हौसला अफ़ज़ाई अपने मजमूनों और  नज़्मों के  ज़रिये करतें हैं वोह सभी जंगजू हैंऐसे तमाम अफराद को फौजी ही तस्सवूर किया जाता है जो जंग मे किसी भी क़िस्म से फौजीओं की मदद करतें हैं.

प्यारे इस्लामी भाईयों अगर हिंद मे आप अपनी फलाह ओर बक़ा चाहते हो तो जिहाद के लिए तय्यार रहोअपने  ईमान और मज़हब इस्लाम पर कामिल यक़ीन रखो. कोई भी काफिर सच्चे और ईमान वाले मुस्लिम को ज़र्रा बराबर नक़सान नहीं पहुँचा सकता है. आज हमको हज़ारों लाखों फौजी (जिहादी) नहीं चाहिये बस ईमान वाले मूसलमान अगर जिहाद फी साबिलीलाह का हिस्सा बन गए तो एक एक हक़ का सिपाही - लाख शिद्दत पसन्द काफिरों, संघी और बीजेपी (भारतीय जन्खा पार्टी) के आतंकियों को मौत की नींद सूला  कर जहन्नुम रसीद कर  सकतें हैं.

जिस तरह २०१४ के बाद कई मजमूनों और तब्सिरों मे नासूरों का जिक्र इस सहफ़ी ने बेशुमार बार किया है.  कश्मीर, बाबरी और हुर्रियत.   कश्मीर को पका हुआ तस्लीम किया था, बाबरपुर (माज़ी की अयोध्या) की शहीद मस्जिद को ऐसा नासूर जो अभी पक रहा है और मुस्लिम अवाम का जज़्बाये हुर्रियत कच्चा है लेकिन वक़्त के साथ पकेगाअब बाबरपुर की मस्जिद का नासूर कश्मीर के बाद दूसरा नासूर है जो पक चूका है बिलाखीर हिंद पर हुर्रियत रा नासूर होगा जो पकेगा.

फिल वक़्त इस जिहादी के साथ उसका अकेला साथी है हम दोनों ने मिल कर काफ़िरों की नींद हराम कर रखी है, हर जानिब इनके उपर मौत की तारिकी और खौफ़ छाया हुआ है अगर दो तीन ईमान वाले काफ़िरों को मौत की नीद सूला कर ख़ुशी मेहसूस करने वाले साथ जाएं तो उस मुजाहिद की १५ मिनिट वाली बात सच्ची साबित कर देंगे और इस सरज़मीन से एक एक शिद्दत पसंद काफ़िरएक एक संघी, हर एक जन्खा पार्टी के नुमाइंदे को मौत के घाट उतार देंगें.

लेकिन कुछ तंज़िमे ऐसी हैं जो हो सकता है काफ़िरों या नियोन  से मिली हो सकती हैं ऐसी तंजिमों पर भी बारबार नज़र बनाये हुए हैं, जो इस्लामिक ममलेकत पाकिस्तान से हद दर्जे का बुगज़ कीना ओर ज़हर  रखतें हैं. उनको काफ़िर, ज़ालिम दरिंदा सिफ़त बादशाह के हरम मे जा कर ऐसी गुज़रिश करने मे कोई शर्म हया नहीं की पाकिस्तान पर हमला कर के बम्बई के क़तले आम और कसाब की हिमाक़त का बदला ले मोदी हुकूमत. ऐसी मुनाफ़िक़ सोच को कुचलना होगा यह वही लोग है जो अपने आला की तरह सिर्फ़ हूकुमात की ग़ुलामी करना जानतें हैं. कभी इनके आला ने अग्रेज़ों की ग़ुलामी की थी और कभी भी उनके ज़ुल्म बरबर्यत शिद्दत के खिलाफ़ फतवा नहीं दिया और वैसा हीं अब उनके जांनशीन  कर रहें हैंइस बात से इनको कोई सरोकार नहीं की इनके कहे हुए अल्फ़ाज़ से उम्मते मुस्लेमा का कितना नक़सान होगा या इस्लाम को किस क़दर ज़र्ब लगेगी. दूसरी बात ऐसी तंजीमें मुसलमानों का क़तले आम करने के लिए काफ़िरों से मुतालबा कर रहीं हैं तीसरी बात यह लोग हिंदु अवाम का क़िसास  मुस्लिम मुल्क से लेना चाहतें हैं, वोह भी दुनियां के सबसे ज़्यादा ख़तरनाक ज़ालिम क़साई  जल्लाद काफिर बादशाह  ज़रिये.   पस यही लोग गुमराह हैं और क़ुरान की खुली खिलावर्ज़ी करने वाले हैं

बम्बई हमला हिंदु दहशतगर्दों का साजिश का नातीजा था सिर्फ़ हेमंत करकरे को शहीद करना था, जिसके और साजिश के तार दहशतगर्द  इजराइल से जुड़े हुए थेइन दोनों दहशतगर्दों ने ऐसा काम किया के इल्ज़ाम पाकिस्तान के ऊपर लग जाए. क्या नाथुराम को कोई भी तालिमी आफ़्ता दानिश मंद भूल सकता है, की मुस्लिम आवाम और पाकिस्तान को बदनाम करने के लिए उसने अपना खतना करवाया और इस्लाम का इल्म लिया फिर पाकिस्तानी परचम हाथ मै ले कर सर पर टोपी पहन कर बाबाये क़ौम को गोली मारी थी. ऐसा करने से उसकी दो ख्वाहिशें पूरी हो रही थी एक सरे दस्त मुस्लिम अवाम पर अक्सरीयत हिंदु तबके का ज़वाल उतरेगा दूसरा पाकिस्तान की होगी बदनामी.

अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...