Friday, 1 January 2021

२०२१ से २०२३ तक का सफर केसा होगा

अज़ीज़ नाज़रीन,   नए साल के आगाज़ पर कुछ ख़ास मुद्दों पर आप हज़रात के रू बरू आया हूँ।  तीन बातें आप हज़रात के रू बरू रखना चाहता हूँ।   

         जिस तरह गुजिश्ता साल का आगाज़ नसरानी गुलामों के खिलाफ एहतेजाज और खाना जंगी के मरहले से हुआ था इस साल भी वही हालात दरपेश हैं।  गुजिस्ता साल यह तोहमत मुस्लिम अवाम के ऊपर लगाईं गई थी, के वोह गद्दार और पाकिस्तानी हैं, जबकि उस एहतेजाज में ना सिर्फ मुस्लिम बल्कि उस सियाह क़ानून की ज़द में आने और उसकी तकलीफ भोगने वाले तमाम मुत्तासिर फ़िरक़े मौजूद थे। और वोह एहतेजाज महज़ मुस्लिम अवाम तक महदूत नहीं था, बल्कि हिन्दू मुस्लिम सिख दलित तमाम अफ़राद एहतेजाज का हिस्सा थे।   लेकिन संघी और जनखा पार्टी ने उस एहतेजेज को पाकिस्तान परस्त गद्दारों की टोली और ना जाने की किन अलफ़ाज़ से नवाज़ा थाइस साल भी वही सूरते हाल है,. लेकिन इस बार मुस्लिम अवाम नहीं  किसान एहतेजाज को अवाम के तक़रीबन हर तबक़े की हिमायत हासिल हैलेकिन अब उस एहतेजाज को खालिस्तानी बोल  कर बदनाम किया जा रहा है.   यह सिलसिला चालू रहेगा और अगस्त २०२१ के आस पास हिन्दू अवाम इन  ज़ालिमों दहशतगर्दों कसाइयों से सख्त खफा होंगेफिर वही एहतेजाज  २०२२ तक जाएगा

.         हज़रात  दूसरा मसला क़ौमी तेहवारों जैसे २६ जनवरी और १५ अगस्त की निस्बत से है,.  नाज़रीन इस सहाफी का साफ़ तोर पर मानना है की जब दस्तूर  की खिलाफवर्जी की जा रही हैजब तमाम सियाह क़ानून अवाम के ऊपर मुस्सल्लद  किये जा रहें हैं. जब अवाम को उनके दस्तूरी हक़ से महरूम किया जा रहा हैजब दहशतगर्द बजाये दस्तूर और क़ानून का पासो लिहाज़ करने के उसकी सख्त खिलाफवर्जी कर रहें हैबंदूक की नौक पर  किसी भी अफ़राद को गिरफ्तार किया ,जा रहा है,. जब मुख़लिफ़ीनों के घरों पर और उनके बीवी बच्चो को सी.बी.आई, डी की धौंस दिखा कर डराने और धमकाने की कोशिश की जा रही है,.  इतना ही नहीं बेगुनाह तालिबे इल्म, सियासतदां, अवाम को  बग़ैर किसी जुर्म के जेलों में ठूस दिया गयातो ऐसे दस्तूर की खुशी नही बनाई जाए  तो बेहतर है,.  जिस दस्तूर को क़ायम करने के लिए बाबा साहब जैसे अज़ीम रहनुमा ने अपना सब कुछ वक़्फ़ कर दिया था, अब अगर उसी दस्तूर को  दहशतगर्द, ज़ालिम, ना इन्साफ, अपनी बंदूक या तलवार के ज़ोर पर कुचल डाले खुले आम उसकी ख़िलाफ़वर्ज़ी करे फिर तसव्वुर करे की यौमे जमुहरिया की खुशी बनाई जाए तो ऐसा किसी भी बाशऊर अवाम के लिए मुमकिन ना होगा, फिर जो लोग यौमे जमुहरिया बनायेगे वोह उन अवाम की दिल शिकनी करेगें जिनका दस्तूरी हक़ दहशतगर्दों ने छीना है और बाबाये दस्तूर भीम राव आंबेडकर की तोहीन करेंगें। उसी तरह जो लोग यौमे आज़ादी बनायेगे वोह बाबाये क़ौम महात्मा गाँधी के जज़्बाए हुर्रियत और उसको हासिल करने के दौरान दरपेश तकालीफ़ की तौहीन कर रहें हैंबेशक मई २०१४ से पेश्तर और उसके बाद २०१तक  भारत के किसी भी अवाम के लिए २६ जनवरी और १५ अगस्त जैसे क़ौमी तेहवार मुस्सरर्त फ़राहम करते थे. लेकिन जब  दहशतगर्दों, ज़ालिमों, ना इंसाफों ने अवाम को फिर से गुलाम बना लिया है और ज़ुल्म क़त्लो गारत की इन्तहा कर दी है तो किसी भी बावक़ार अवाम को ऐसे तेहवार मुनक़्क़िद करना मतलब दहशत को फरोग देना हैऔर यह ज़ाहिर करना हैपहले हम नसरानी गुलाम थे अब उन नसरानी गुलामों के गुलाम हैंजब दस्तूर ही नहीं रहा हर काम ख़िलाफ़े दस्तूर हो रहा है जब आपकी अपनी कोई सोच कोई आज़ादी नहीं रही आप दहशतगर्दों के खिलाफ  कुछ बोल नहीं सकते तो काहे का योमे जमुहरियत और केसा जश्ने आज़ादी। 

       नाज़रीन २०२१ में यह सहाफी सोशल मीडिया को अलविदा कह चूका हैअब से इस सहाफी का कोई भी मज़मून आप सोशल मीडिया प्लेटफार्म फेसबुक, व्हाट्स अप, ट्वीटर या किसी और सोशल मीडिया साइट पर ना देख सकेगेंअलबत्ता इस सहाफी की जंग नियोंग जैसे ज़ालिम, नाइंसाफ, क़ातिल, मस्तूरातों की असमतदारी करने वाले दरिंदों के खिलाफ जारी रहेगी।  अलबत्ता अब आप हज़रात उसके उर्दू नज़्म हिंदी और इंग्लिश मज़्मूनों का मुताला करने के लिए उसके यह तीन साइट देखना पड़ेगी

.                http://zuberpakshayri.blogspot.com/    

.      https://zuberjournalist.blogspot.com/   

     https://autojourna.wordpress.com/     

नाज़रीन जिस तरह से नियोंग के ज़ालिम फौजी दस्तूर की खिलाफवर्जी करतें हैं जिस तरह से इंसानी हुक़ूक़ की खिलाफवर्जी करतें हैं, जिस तरह  अक़लियतों के हुक़ूक़ की खिलाफवर्जी करतें हैं जिस तरह से मस्तूरातों के ऊपर ज़ुल्म तशद्दुत करतें हैं, जिस तरह तिरंगे परचम की इज़्ज़त ज़ालिम, कसाइयों ने  अपने एक दहशतगर्द की लाश  को लपेट कर पामाल किया था और राजिस्थान में एक अदालत के ऊपर हमला कर के तिरंगा निकाल कर अपनी दहशतगर्द तंज़ीम का परचम लहरा दिया था तो ऐसी सूरत में किसी भी इज़्ज़तदार शहरी को ना तो यौमे जमुहृयत बनाना चाहिए और ना ही जश्ने आज़ादी  में शामिल होना चाहिए  और ना ही अब तिरंगे  परचम की अज़मत रह गई है

सीधी सी बात है या इस सहाफी का सीधा फलसफा जब कोई चीज़ नापाक या गन्दी हो जाती है तो कोई भी बावक़ार और इज़्ज़तदार इंसान उसको हाथ नहीं  लगाता

अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...