अज़ीज़ नाज़रीन,
आज इस सहाफी की तंज़ीम “ऑटोनोमस जौर्नालिस्ट” के सरबराहों और आला ओहदेदारों ने एक अहम क़रारदार पेश किया है, जिसमे तक़रीबन मौजूद सभी हज़रात एक राये से मुत्तफ़िक़ थे और सभी का यह मानना था की ज़ाफ़रानी तंज़ीम बीजेपी को भारतीय ज़न्खा (हिजड़ा) पार्टी से मुखातिब किया जाए। क़रारदार इस सहाफी के दस्तखत होने के बाद नाफ़िज़ किया जाएगा। फिर तंज़ीम के किसी भी ओहदेदारों या रज़ाकारों ने अगर भारतीय जनता पार्टी को भारतीय जनखा पार्टी नाम से नहीं मुखातिब किया तो उसके ऊपर एक्शन होगा। एक्शन क्या होगा उस क़ानून का मसौदा तैयार किया जा रहा है।उसके ऊपर माशी पाबन्दी के साथ साथ, तंज़ीम से अलहदगी समेत दीगर सज़ा का ज़िक्र उस क़ानून में होगा।
नाज़रीन अब आपको बताता हूँ की ऐसा क़रारदार पेश करने के पीछे की हिकमते अमली किया थी।गुजिश्ता कई रोज़ से तंज़ीम के रज़ाकारों और दीगर ओहदेदारों साथ साथ अवाम के एक ख़ामोश तबक़े की शिकायतें आ रही थी की भारतीय जनखा (हिजड़ा) पार्टी के कई अमल हिजड़ों जैसे हैं। यह पार्टी मर्दों वाली क़ुव्वत और ताक़त नहीं रखती है इसलिए पीछे से करवाने में इसको सुकून और इत्मीनान फ़राहम होता है। इतना ही नहीं रज़ाकारों ने इस बात की भी तस्दीक़ की है की इस पार्टी में जितने भी सियसतदाँ हैं वोह सभी हिजड़े हैं, ना सिर्फ इस पार्टी में बल्कि संघ और भक्त भी हिजड़े हो गए हैं। उनको पकड़ पकड़ कर वतन परस्ती के नाम पर ड्रग की मज़ीद मिक़्दार दी जाती है और सिख, मुस्लिम और क्रिस्टी अवाम के खिलाफ ज़हर का नशा इनके दिलों दिमाग़ में पेवस्त किया जाता है। जिससे यह भक्त नाबीना हो जाएँ और इनको पार्टी के आगे कुछ नहीं दिखे वतन परस्ती के नाम पर सिर्फ और सिर्फ झूट फरेब धोका क़त्ल नाइंसाफी भी इन लोगों को इन्साफ दिखाई दे। हिजड़ा पार्टी में आये हुए भक्त को उस हद तक जिस्मानी, नफ़्सानी और ज़ेहनी अज़ीयत दी जाती है की उसकी सोचने समझने और जिस्मानी क़ुव्वत ज़ाइल हो जाती है और वोह बन जाता है हिजड़ा।
नाज़रीन दूसरी वजह इस पार्टी को भारतीय जनखा (हिजड़ा) पार्टी यह नाम देने के पीछे थी की पार्टी का हर रकून, संघ और शिद्दत पसंद अपनी लुगाई (जमुहरियत) को छोड़ छोड़ कर भागते हैं। फिर पार्टी का सरबराह तो बराहे रास अपनी लुगाई को छोड़ के फरार हो गया है। उसमे इतनी क़ुव्वत और मर्दानगी नहीं के औरत के जज़बात और आंसूओं का मुक़ाबला कर सके और इन्साफ करे तो वोह फरार हो गया। हिजड़ा।
नाज़रीन लंगूर और लँगूरनियाँ, शिद्दत पसंद हिजड़े भारतीय हिजड़ा पार्टी के इसरार पर एक सवाल हर दम इसमें ख़ास है हिजड़ा राजदीप मुस्लिम इत्तेहाद तंज़ीम के सरबराह असदुद्दीन को बोलतें हैं "वोट कटुआ", में उन तमाम हिजड़ों से बोलता हूँ वोट कटुआ होना तो हिजड़ा होने से बेहतर है। कम से कम हमारी लुगाई (जमुहरियत) हमारे पास है और असदुद्दीन हमेशां अपनी लुगाई (जमुहरियत) के बारे में बात करतें हैं लेकिन हिजड़ा तो अपनी लुगाई को कभी पडोसी (पाकिस्तान), कभी मुस्लिम कभी हिन्दू कभी झूठे इलज़ाम, कभी जिन्ना के पास भेजतें हैं ताके विकास नामी बालक पैदा हो सके और हमको हमारी लुगाई (जमुहरियत) से बच्चा (वोट) ना मिले तो ना सही कम से कम इन लोगों के पास भेजने से ही बालक विकास मिल जाए।
अब यह सहाफी ललकारता है तमाम लंगूर और लँगूरनियों को ख़ास राजदीप सरदेसाई को की वोह अपनी मर्दानगी ज़ाहिर करें और साबित करें की वोह भारीतय हिजड़ा पार्टी के नुमाइंदे नहीं हैं, बल्कि भारत के मोहज़्ज़ब शहरी और मर्द हैं। इनमे अभी सवाल करने की क़ुव्वत, जिस्म में इन्तेक़ामी हिकमते अमली और अपनी लुगाई (जमुहरियत) को मेहफ़ूज़ करने की ताक़त बची है। और जैसा की असदुद्दीन ओवेसी के ऊपर यह लंगूर इलज़ाम लगातें हैं वोह बराहे रास बीजेपी के नुमाइंदों अमित, मोदी और किसी बड़े वज़ीर से सवाल पूछ के दिखाएं की आप तो वोट हिजड़ा हो। जैसा की असद को बोलते हैं वोट कटुवा वैसा ही ज़ाफ़रानी तंज़ीम को बोले वोट हिजड़ा। अगर इन लंगूरों में क़ुव्वत और ताक़त की कमी है तो सहाफी जुबेर का टॉनिक पी कर पूछे मतलब मेरे नाम से पूछे की सहाफी जुबेर ने आपको वोट हिजड़ा बोला है इस पर आपका क्या कहना है।
ऐसा सवाल करने के पीछे एक दूसरी हिकमत यह भी है जब इन हिजड़ों पर हक़ीक़त बयान होगी तो उनकी चेहरों के तासुररात और रंगत की क्या हालत होगी वोह कैमरे में क़ैद होना चाहिए। तीसरा जब असद को वोट कटुआ कहा जाता है तो मंच के नीचे बैठे हिजड़ों की ख़ुशी का कोई ठिकाना ना होता है वोह सब हंस पड़ते हैं। तो क्या जब भारीतय हिजड़ा पार्टी को वोट हिजड़ा कहा जाएगा तो वही हसी और ख़ुशी का एहसास इन हिजड़ों का होगा जो असद के ऊपर तंज़ कसने पर होता है।
इस सहाफी ने हिजड़े ज़ाफ़रानी साधू योगी को अभी दो दिन पहले ही १५ दिनों की मोहलत दी है और बोला है तेरेको बोहोत नाम तब्दील करने की हवस है तो पहले अपनी पार्टी में जो शाहनवाज़, नक़वी, मोहसिन जैसे मुनाफ़िक़ भरे पड़े हैं उनका और उनकी नस्लों का नाम तब्दील कर के दिखा और अपने आपको मर्द ज़ाहिर कर।
अब दूसरी १५ दिनों की चुनौती इन लंगूरों को है ख़ास राजदीप सरदेसाई को की वोह भारतीय जनखा (हिजड़ा) पार्टी से सवाल करें की आप तो वोट हिजड़ा हो अगर इनमे जिस्मानी और ज़ेहनी ताक़त की कमी है तो सहाफी जुबेर का नाम ले कर पूछे की यह सहाफी आपको वोट हिजड़ा बोलता है आपका क्या कहना है। इन लंगूरों का वक़्त शुरू होता है अब।
नाज़रीन इस साहाफी की वाज़े राये है सियसत करो किसने रोका है लेकिन अपनी लुगाई (जमूरियत) को तो मुस्लिम, पडोसी (पाकिस्तान), जिन्ना के पास मत भेजो। हर इंतेखाब में यही हो रहा है आज २०१३ के बाद से यही देखता आया हूँ। जहाँ इंतेखाब आये अपनी लुगाई (जमूरियत) को सजा धजा के मुस्लिम, पाकिस्तान, बाबरी, कश्मीर, जिन्ना के पास भेज देतें हैं। मतलब तुम हिजड़े हो तुमको अपने बाजूवे क़ुव्वत और अपने किये हुए कामों पर एतेमाद नहीं है की विकास तुमसे पैदा होगा। तो अवाम को गुमराह कर देना।
खैर यह बात तो ते है जितने भी बीजेपी की नुमाइंदे हैं वोह सब
पडोसी देवर या साधू की हरामकारी का नतीजा हैं।
इनमे अमित भी आ गया साधू भी आ गया मोदी भी और तेजस्वी सुरिया भी अल गलज़ हिजड़ा
पार्टी का हर एक नुमाइंदा हिजड़ा है। और यह
बात इनके ना जाइज़ बयानों से साबित होती है।
हैदराबाद में बाढ़ आई हिजड़ा अमित बोलता है की श्रीमान असदुद्दीन उस वक़्त कहाँ
थे,
हमारे हिजड़ों ने बाढ़ मुत्तसरीनों की इमदाद की। क्या झूट है अरे होश के नाखुन ले,
इस सहाफी के पास वीडियो और हैदराबाद से न्यूज़ कवरेज आया, असदुद्दीन
अकबर उद्दीन घुटनों घुटनों पानी में अवाम को रात को २ बजे बहार निकालते हुए देखे गए। उसके बाद दारुस्सलाम में इमदाद की रक़म तक़सीम करते
हुए सिर्फ मजलिस उसके रकून असद और अकबर ही देखे गए। कहीं भी हिजड़ा पार्टी के नुमाइंदे नहीं थे वोह सब
ऐसे ही फरार हो गए थे जैसा की उनका सरबराह अपनी लुगाई को छोड़ कर फरार हो गया है।
लंगूरों को १५ दिनों की ललकार है की वोह हिजड़ा पार्टी से सवाल करें लेकिन खुशदिल और खुले हुए ज़हन के सहाफियों से गुज़ारिश है की अगर उनको जाइज़ और उम्दा लगे तो वोह भी हिजड़ा पार्टी से सवाल करें की आप तो वोट हिजड़ा करते हो। यह गुज़ारिश है चूनौती नहीं। जैसे की हैदराबाद में अमित के दाखिल होते ही एक सहाफी ने उसको छील डाला इतने चुब्ते हुए सवाल किये बाढ़ के वक़्त आप कहाँ गायब थे हैदराबाद के साथ मुनाफ़िक़ाना रुख काहे को इख़्तेयार किया, कर्णाटक को इमदाद दी लेकिन हैदराबाद को काहे को नज़र अंदाज़ किया और अब वोट की भीक मांगने चले आये। परेशान हो गया था हिजड़ा अमित।
उसके कपड़ों के साथ साथ उसकी खाल भी नौच ली थी।