"इल्म
हासिल करो, अगर जाना पड़े (सीन) चीन"
"इल्म
का हासिल करना हर मोमिन (मर्द और औरत) पर फ़र्ज़ है"
"गर तौप हो मुक़ाबिल, तो अख़बार निकालो"
एक
बात वाज़े और साफ़ है की शैतान अगर किसी से ख़ाइफ़ होता है तो वो दो चीज़ें हैं एक आलिम
और दूसरा अल्लाह का ज़िक्र. एक शख्स बुज़ुर्गी
के मर्तबे को पहुंच जाए और अगर उसके पास इल्म
की कमी है गफलत का मारा है तो उससे शैतान ख़ौफ़ज़दा नहीं होगा. वहीँ दूसरी
जानिब एक इंसान पस्त इबादत करता है लेकिन इल्म और हिकमत का माहिर है तो शैतानी फ़ैल
से मेहफ़ूज़ रहेगा और शैतान उसको ग़ाफ़िल नहीं कर सकेगा.
खाकी और ज़ाफ़रानी दहशत के ज़ेरे साये भारत में अपनी तक़दीर को कोसती मौलाना जोहर अली यूनिवर्सिटी के कुछ दिल कश मंज़र
इल्म
भी दो तरीके के होतें हैं. एक पाक और रूहानी
इल्म दूसरा गलीज़ और शैतानी इल्म. रूहानी इल्म
से तालिबे इल्म को दीन और दुनियाँ दोनों हासिल होतीं हैं जबकि शैतानी इल्म के महेरीनों
को सिर्फ और सिर्फ शैतानी क़ुव्वत हासिल होती है.
रूहानी इल्म के माहिरों से शैतान डरता है घबराता है उनको कोई तकलीफ नहीं पंहुचा
सकता, जबकि शैतानी आलिमों से नहीं घबराता लेकिन अगर शैतान की खिलाफ वर्ज़ी की उसकी हुकुम
अदूली की तो वो उस आलिम और उसकी क़ौम को भी तबाह और बर्बाद कर देता है.
आज
के हलाते हाजरा में भारत के ज़ाफ़रानी महाज़ और दहशतगर्द, मुस्लिम तुलबा को जिस तरह से
दुनयावी और रूहानी इल्म से दूर रख रहे हैं उसकी वाहिद वजह है मुस्लिम माशरे में बढ़ती
हुई बेदारी और दीन और दुनियाँ का इल्म को हासिल करने की चाहत. १९४७ से ले कर २०१९ तक मुस्लिम ज़ेहनियत काफी कुछ
तब्दील हुई है और आज के वाल्देन अगरचे ग़ुरबत और कसमपुरसी में ज़िन्दगी गुज़ारने पे मजबूर
होंगे लेकिन अपनी औलादों को आला तालीम देतें हैं.
अपने बच्चों को आला तालीम से सरफ़रोज़ करने के लिए खुद एक वक़्त का खाना कम खायेंगे
लेकिन उसकी स्कूल कॉलेज की फीस का एहतेमाम पहले करते हैं, और ये अच्छी सोच है आज के
दौर में भारत में अगर मुसलमानों को हिन्दू शिद्दत, हुकूमत के ज़ुल्म, ना इंसाफ़ी, मक्कारी,
फरेब, धोकेबाज़ी और हिन्दू दहशतगर्दी से मुक़ाबला करना है तो उनको तालीमी आफ़्ता होना
ही पड़ेगा. मुस्लिम अवाम को हुकूमत की जानिब
से फैलाये जाने वाले हर फरेब की हिकमत और पोशीदा मक्कारी को बा खूबी जानना पड़ेगा. अगर कोई ज़ाफ़रानी मुस्लिम नुमाइंदा ख़्वाहा मर्द या
औरत हुकूमत की कारगरदेगी, मक्कारी, फरेब को मुसलमानों के हक़ का फैसला बोल के बदगुमानी
पैदा करता है तो उसके फरेब की धज्जियाँ उसके रू बा रू उड़ाने का जज़्बा होना चाहिए और
वो जज़्बा आता है आला तालीम और हर मसले का मुक्कम्मल इल्म होने से.
कांग्रेस
और ज़ाफ़रानी महाज़ दोनों ही एक सिक्के को दो पहलू हैं. सिक्के का एक रुख कांग्रेस है तो दूसरा ज़ाफ़रानी
तंज़ीम. जिन मुद्दों पे कांग्रेस ने मुस्लिम
माशी हालत और नस्ल को तबाह करने के सख्त तरीन क़वानीन बनाये थे उन अधूरे कानूनों और
खवाबों को अब आगे की जानिब ज़ाफ़रानी पार्टी ले कर जा रही है. आज ट्रिपल तलाक़ पे ज़ाफ़रानी तंज़ीम मुस्लिम ख्वातीनों
को हक़ दिलवाने के नाम पे अपनी पीठ थपथपा रही है लेकिन हिन्दू शिद्दत पसंदों ने मुस्लिम
माशरे और मियाँ बीबी की हुक़ूक़ को पोशीदा हिकमत इख्तियार कर के क़त्ल किया है. और इस
क़ानून के दूरंदेशी नताइज भयानक होंगे. अगरचे
किसी जोड़े में ना इत्तेफ़ाक़ी हो गई फिर औरत के हमदर्द आज के जैसे उकसाने वाले संघी बाज़ारों
में कूचों में गलिओं में बोहोत मिल जायेगे.
जैसे की आज मीडिया के शो में बैठ के मुस्लिम वुक्ला खातून, मुस्लिम लेडीज सोशल
वर्कर्स और लेडीज प्रोटेक्शन विंग वाली मस्तूरात, बिल की हिमायत में खड़ी हैं. लेकिन उनको ये बताने में शर्म महसूस हो रही है की
तलाक़ की अर्ज़ी पे पुलिस शोहर को गिरफ्तार कर लेगी फिर अगर तीन महीने तक उस बीवी से
शोहर ना मिला तो दूसरी तलाक़ वाक़े हो जायेगी फिर उसी हिसाब से तीसरी और फाइनल. अब मसालेहत और सुलाह के तमाम रस्ते बंद हो जायेगें. उसके बाद शुरू होगा संघी दहशतगर्दों का असली खेल
जिसमे शामिल हैं पुलिस और हुकूमत के नुमाईंदे.
और उस औरत को ज़बरदस्ती हिन्दू दहशतगर्द से शादी करवाने के लिए दबाव बनाया जाएगा
और कानून कोर्ट के ज़रिये उसकी शादी हिन्दू से करवा दी जायेगी. जिसका ज़िक्र इस सहाफी ने अपनी जांच पड़ताल के बाद
कई सारे ख़बरनामों में किया है. और हाल ही में अपने हिंदी मुस्लिम ख़वातीनों और बच्चिओं को जिन्सी गुलाम बनाया... में
किया है.
खाकी और ज़ाफ़रानी दहशत के ज़ेरे साये भारत में अपनी तक़दीर को कोसती मौलाना जोहर अली यूनिवर्सिटी के कुछ दिल कश मंज़र
दूसरी
जानिब रूहानी आलिमों का वो तपका है जिन्होंने शैतानी फ़ैल और शैतानी ताक़त को अपने ताबे
कर रखा है और शैतानी अमलियात का उनपे असर सिफर और उम्मते मुस्लेमा में बोहोत कम हो
रहा है. इसीलिए संघी दहशतगर्द अगर आज ख़ौफ़ज़दा
है और गलीज़ और गन्दी गाली देतें हैं तो वो सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम आलिमों और मौलानाओं
की जमात को देतें हैं. उनके ऊपर सख्त तरीन
तोहमत और इलज़ाम तराशी करते हैं उसकी वजह ही ये है की उनका हर शैतानी हरबा मौलानाओं
और मुस्लिम आलिमों के सामने पस्त और कमज़ोर हो कर या तो मारा जाता है, या उनका गुलाम
हो कर दाख़िले इस्लाम हो जाता है.
आज
जिस हिसाब से मुसलमानों के तालीमी इदारों को निशाना बनाया जा रहा है उससे ज़ाफ़रानी हुकूमत
की मुस्लिम तुलबा से इल्म की रौशनी छीनने की साजिश साफ़ ज़ाहिर हो रही है. चाहे वो अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, जामिया मिलिया
इस्लामिया यूनिवर्सिटी का अकलियती हैसियत ख़त्म करने की साजिश हो या जब वज़ीरे तालीम
स्मृति ईरानी के जानिब से अक़लियति तालीमी इदारों पे चालाई जाने वाली चाबुक हो वो सभी
कारगरदेगी मुस्लिम तुलबा को इल्म से दूर करने की साजिश है.
हुकूमत
की इस ज़ाफ़रानी साजिश और ज़हर का अगला शिकार मौलाना जोहर अली यूनिवर्सिटी है. जिसके अंदर खाकी डाकूओं और ज़ाफ़रानी दहशतगर्दों ने
बरहना रक्स किया और अपनी खाकी चड्डीओं का खूब मुज़ाहेरा किया. रामपुर के पार्लिअमानी इंतेखाबात में तो सिर्फ
एक खाकी जांघिया (चड्डी) का इल्म हुआ था उस खाकी जांघिये वाली को बरहना करने पे पता
चला की तमाम अमला खाकी चड्डीओं से भरा पड़ा है.
हुकूमते
हिन्द और उत्तर प्रदेश की ज़ाफ़रानी हुकूमत से ऐसी आलमी यूनिवर्सिटी और तालीमी इदारे
की उम्मीद मुस्लिम नहीं कर सकते थे बरक्स अगर किसी ने इल्म की शमा को रोशन किया है
उसको भी ये ज़ाफ़रानी गुंडे अपनी दहशत से बंद कर देना चाहते हैं, ताके मुस्लिम अवाम जहालत
के अंधेरों में ग़र्क़ाब हो जाए और इनकी नस्लों का तालीम की कमी के सबब हम खूब इसतेसाल
कर सके.
हिन्दू
शिद्दत पसनदी का ज़हर और दहशतगर्दी के तरबियती अड्डे
आज
मुसलमानों को दहशतगर्द, जाहिल, गुमराह, आक्रांता और ना जाने कैसे कैसे अलक़ाब से नवाज़ा
जाता है. मदरसे दहशतगर्दी का अड्डा हैं वहां
मुस्लिम तुलबा के ज़ेहन को शिद्दत की जानिब माईल किया जाता है. लेकिन आज तक भारतीय मीडिया के जितने भी लंगूर और
लँगूरनियाँ हैं जिन्होंने अपने स्टुडिओं में बरहना (नंगा) नाच किया और लँगूरनियों ने
नंगी हो कर अपने खाकी जांघिये का खूब मुज़ाहेरा कैमरे के सामने किया लेकिन ये साबित
करने से क़ासिर रही / रहे की किसी भी मदरसे
में शिद्दत की तालीम दी जाती है या पुलिस को मदरसे से असलाह, बम, बन्दूक बरामद हुए
हों या ऐसी ज़ालिमाना, इंसानियत या किसी ख़ास मज़हब के मानाने वालों के क़त्ल की मंसूबा
बंदी की जाती हो.
हिन्दू
शिद्दत पसनदी का ज़हर और दहशतगर्दी के तरबियती अड्डे
इससे
क़ब्ले अपने कई मज़मून में ये सहाफी हक़ गोई से इस बात को अवाम के रू बरू रख चूका है की
हिन्दू बच्चों में तालीम के बजाये चाकू, त्रिशूल, तलवार और बन्दूक दी जाती है जबकि
मुस्लिम तुलबा के हाथों में क़लम दी जाती है.
हाल ही में ३० जुलाई को अपने एक मज़मून बचपन की तालीम जवानी में काम आई. में
इस सहाफी ने हिन्दू दहशतगर्दों के तरबियती केम्पों के ऊपर एक मज़मून शया किया है.











