तबरेज़ के बाद हुसैन, काफिर हुकूमत ग़ाफ़िल , काफिर दहशतगर्दों के शाना बा शाना साथ. अगला कौन आप या........
काफिर दहशतगर्द (मोदी सैनिक) तबरेज़ अंसारी की शहादत और उनके खून के
दाग़ धोने से क़ासिर थे की एक और मोब लीच का वाक़ेया सामने आया है. इस बार झारखंड से नज़दीक आसाम में एक हकीम या जर्राह
जो की रिवायती अंदाज़ में मरीज़ों का इलाज करते थे उनको लीच करने की खबर है. तबरेज़ को चोरी के इलज़ाम में शहीद करने के बाद असम
में हुसैन अली को ज़िनाकारी के इलज़ाम में लीच कर दिया गया.
खबर सूबे आसाम के मगरिबी ज़िल्हे आंगलोंग के कर्बी गावों से है जहाँ
बरोज़ जुमेरात को एक मस्तूरात की बीनाई का इलाज करने गए हकीम हुसैन अली को ३० से ४०
अफ़राद के हुजूम ने पीट पीट के शहीद कर दिया.
हुसैन ज़िल्हे आंगलोंग के नज़दीक रायकट्टा के रहवासी थे. उनको अवाम ने "कवी राज" के खिताब से नवाज़ा था, क्योंकि वो रिवायती अंदाज़ में इलाज करने के लिए मशहूर थे. वो १ जुलाई को एक काँड़ी मस्तुरात के इलाज के लिए उसके घर गए थे. वो इलाज की रिवायात मुकम्मल कर रहे थे जिसमे दो तीन या उससे ज़्यादा वक़्फ़े को उनको मरीज़ के पास आना होता था. एक बार इलाज करने के बाद वो फिर आयेगें बोल के उस औरत के घर से वो चले गए.
०३ जुलाई को वो फिर से उस काँड़ी औरत के घर गए और उन्होंने उसका इलाज़ रिवायती इंदाज़ में शुरू किया. अली ने कुछ धूनी नुमा चीज़ उस काँड़ी औरत को सूंघने को दी जिससे उसको थोड़ी घुनूदगि तारी हुई.
जब अली धूनी लगा के उस औरत का इलाज कर ही रहे थे जो के अभी मुकम्मल भी नहीं हुआ था की दहशतगर्दों की शक्ल में हुजूम आया और हुसैन को ज़िनाकारी के इलज़ाम में पीट पीट के शहीद कर दिया.
हिन्दुस्तान में हलाते हाजरा में सहाफी जुबेर की नुक़्ताये नज़र.
भारत की तक़सीम और आज़ादी की इस जंग में एक और मुसलमान को शहीद कर दिया
गया. जिस तरह काफिर दहशतगर्द (मोदी सैनिक) झूट और फरेब की बुनयाद पे कश्मीर में मुस्लिम
अवाम को आतंकी नाम दे कर शहीद करते हैं उसी तरह अवामी हलकों में ये काफिर दहशतगर्द
(मोदी सैनिक) मुस्लिम अवाम को दिगर झूठे और फरेबी इलज़ाम लगा कर शहीद कर रहे हैं. कभी बच्चा चोरी के इलज़ाम में कभी गाये चोरी के इलज़ाम
में कभी गाये का गोश्त रखने के इलज़ाम में कभी गाये का गोश्त खाने के इलज़ाम में कभी
बाइक चोरी के इलज़ाम में कभी लव जिहाद के इलज़ाम में कभी ग़ैर मुल्की तस्सव्वुर कर के
कभी गद्दार तस्सव्वुर कर के.
वीडियो में मक़तूल तबरेज़ हिन्दू दहशतगर्दों से मुतवातिर गाडी चोरी से इंकार
कर रहे हैं.
एक काफिर दहशतगर्द से इस सहाफी की ज़ुबानी जंग हो गई और तवील जंग और उसके हर हमले का माक़ूल जवाब देने के बाद आख़िरकार वो काफिर दहशतगर्द (मोदी सैनिक) भाग खड़ा हुआ.
उसने कहा पाकिस्तान में भी हिन्दू अवाम के साथ ऐसा ही होता है. जो बिलकुल गलत बयानी है. ये ही ज़हर इन काफिरों की नसों में इनके तरबियती अड्डों में पेवस्त किया गया है और इनके दिलों दिमाग को इन्तेहापसन्द बनाया गया है.
अव्वल तो पाकिस्तान में ऐसा कोई मामला दर पेश नहीं आता की हिन्दू अवाम के ऊपर तशद्दुत किया जाता है.
बिल फ़र्ज़ अगर होता है तो उस तशद्दुत की क़ीमत हिन्दुस्तान का मुसलमान काहे को अदा करेगा.
दूसरी बात अगर जैसा पाकिस्तान में काफिरों के साथ होता है वैसा ही तुम अपने मुल्क़ में कर रहे हो मतलब तुम पाकिस्तान के एजेंट हो और उसके इशारे पे अपने ही वतन को कमज़ोर कर रहे हो तुम तो गद्दारे वतन, गद्दारे अमन हो. हिन्दू दहशतगर्द खुद अपने ही मुल्क के साथ गद्दारी कर रहे हैं, और उनका रद्दो अमल अपने ही मुल्क की जड़ों को कमज़ोर कर रहा है.
जो तक़सीम पे जा कर रूकेगा.
आज काफिर हर इस्लामिक मुल्क़ में रह रहें हैं और खूब फ़रोग़ पाते हैं खाते कमाते हैं.
पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, इराक़, दुबाई, अबू धाबी, ओमान, सऊदी, मिस्र, लीबिया, बरुनी, मलेशिया, इंडोनेशिया लेकिन किसी भी मुस्लिम मुल्क़ से आज तक एक भी ऐसी खबर नहीं आई के एक अकेले निहत्ते हिन्दू को ४० - ५० मुस्लिम अवाम के हुजूम ने घेर लिया और उसके मज़हब की बुनयाद पे उसको पीट पीट के हलाक कर दिया.
या ज़बरदस्ती उससे नारा लगवाया.
नारा ए तकबीर अल्लाह हो अकबर.
आज बोहोत से मुस्लिम मौलाना मुस्लिम नौजवानों को गंगा जमुनी तहज़ीब का दर्स देतें फिरतें हैं भाई चारे की नसीहत करते फिरतें हैं.
हम सब एक हैं का नारा बुलंद करते हैं.
दिल्ली दंगे के बाद मौलानाओं की एक जमात भगवाधारी तिलक के सामने सरे तस्लीम ख़म हो गया और हुजूम के सामने ख़ौफ़ज़दा बोलता है हम सब एक हैं, सारे गिले शिकवे दूर हो गए, हम सब एक बाप की ओलाद ही हैं और भाइयों में कहा सूनी होती रहती है.
जो कह रहे हैं सारे गिले शिकवे दूर हो गए अब कोई आलूद नहीं रहा, जो मौलाना भाई चारे का दर्स दे रहे हैं अमन का पैगाम दे रहे हैं तो उनसे ये सहाफी कहना चाहता है कुफ्फार ला इतबार जब १९४७ से आज तक आलूद ख़त्म नहीं हो सका तो आपकी एक ज़र्रा बराबर कोशिश क्या हिन्दू अवाम के ज़हन से आलूद को खत्म करेगी. जब ये लोग अपने खुद के वतन के लिए वफादार साबित नहीं हुए तो इन लोगों से एक मुसलमान के लिए वफ़ा की उम्मीद रखना बेकार है.
जिस मजमे और हुजूम में मौलाना भाई चारे का पैगाम दे रहे थे उसी मजमे में अगर वो इन्साफ की आवाज़ को बुलंद करते तो शायद वो सही और सलामत वापिस अपने घर को ना पहुंच पाते.
जो बात हिन्दू अवाम को मौज़ूं लगेगी वो बात करोगे तो तुम हिन्दुस्तान में ज़िंदा रह सकते हो और अगर अपने हक़, इन्साफ की आवाज़ को बुलंद किया तो हो गए तुम इनके दुश्मन नंबर १.
फिर किस शर्त पे सारे शिकवे गिले दूर हुए, क्या जिन हिन्दू फ़िरक़ापरस्तों ने दंगे को अंजाम दिया था उनकी गिरफ्तारी हुई, क्या इस दंगे में सियासी दख़ल नहीं था, क्या बीजेपी का दो कानून साज़ मनोज तिवारी और एक दुसरे ने दंगा भड़काने के लिए हालात वैसे पैदा नहीं किये थे. मौलाना साहब कब तक आप लोग भाईचारे, अमन, गंगा जमुनी तहज़ीब के नाम पे एक तरफ़ा मुस्लिम अवाम की हक़तल्फ़ी करते रहेंगे.
ये सब लोग असल में संघ और काफिरों के एजेंट हैं.
और राष्ट्रिय मुस्लिम मंच से ताल्लुक़ रखने वाली वो जमात है जो मुस्लिम अवाम को अपना हक़ छोड़ने के लिए ज़बरदस्ती करतें हैं और कहतें हैं बाबरी मस्जिद हिन्दू अवाम को दे देना चाहिए मुस्लिम अमन पसंदी का मुज़ाहेरा करे, क्योंकि मुस्लिम दंगा फसाद पे यक़ीन नहीं करता है.
में उन मुस्लिम मौलानाओं से कहना चाहता हूँ सवाल एक मस्जिद का नहीं है सवाल उस ज़हरीली ज़ेहनियत का है जो मुसलमानों के खिलाफ पेवस्त की गई है के तुम्हारे दुशमन हैं. फिर कश्मीर हो या पाकिस्तान इस्लाम हो या मुसलमान तमाम हिन्दू अवाम की ज़ेहनियत और नियत एक हो जाती है जब इनमे से किसी
एक का या सभी का नाम आता है. अगर इनके हक़ के बारे में बात की जाती है या इनको इन्साफ दिलवाने की बात की जाती है तो तमाम हिन्दू अक्सरियत एक हो जाती है.
फिर मुल्क़ में अमनो अमान की ज़िम्मेदारी सिर्फ अकेले मुस्लिम अवाम की नहीं है ये मुल्क अकेले मुस्लिम अवाम का नहीं है.
अगर मुल्क़ में बदअमनी होगी ख़ाना जंगी जैसे हालात होंगे तो नुकसान उनका ही ज़्यादा होगा जो ग़ैर ज़रूरी नारा मुस्लिम अवाम से ज़बरदस्ती लगवाते हैं "भारत ....... जय, वन्दे...... या दहशतगर्द के नाम पे नारा लगवाते हैं.
"जय जय श्री......" या उसके लंगूर (बन्दर) के नाम पे नारा लगवाते हैं.
ये काफिर दहशतगर्द हैं ये टेर्रोरिस्ट्स हैं ये आई.सीस हैं ये आई.अस.आई. हैं ये बाहरी मुल्क के एजेंट्स हैं जो भारत की तक़सीम के ऊपर और उस मिशन पे काम कर रहें हैं.
तबरेज़ की शहादत नहीं होती अगर अलीमुद्दीन के क़ातिलों को बैल नहीं मिलती, दूसरी बात ज़ाफ़रानी हुकूमत इन दहशतगर्दों की हौसला अफ़ज़ाई करती है बराहे रास नहीं तो उनका अमल ये दिखा देता है की हम तुम्हारे साथ हैं.
अगर अलीमुद्दीन के क़ातिलों की गुल पोशी नहीं की होती बैल मिलने पे मिठाइयाँ तक़सीम ना की होती तो दिगर दहशतगर्दों की हौसला अफ़ज़ाई ना हुई होती और ना ही एक और शहादत, तबरेज़ की हुई होती.
आज जो हिंदुस्तान में हालात पैदा हुए हैं वो सिर्फ और सिर्फ हिन्दू शिद्दतपसंदी और हिन्दू दहशतगर्दी की वजह से ही हैं.
और ये लोग मुल्क़ के वफादार नहीं बल्कि मुल्क के गद्दार हैं और ये ही लोग १९४७ में तक़सीम का एक अहम किरदार थे और आज के न्यू इण्डिया में भी ये ही लोग तक़सीम का एहम किरदार रहे हैं.
हिन्दुस्तान को हिन्दू दहशतगर्दी अपनी आगोश में लेने के बाद आज अगर मुसलमान अपने आपको थोड़ा सा मेहफ़ूज़ महसूस करता है तो वो सिर्फ और सिर्फ असद, अकबर और आज़म जैसे मुजाहिदों की कारगरदेगी की वजह से महसूस करता है नहीं तो मोदी की ज़ाफ़रानी हुकूमत ने काफिर दहशतगर्दों को खुली छूट दे रखी है के खूब खून रेज़ी करो हम तुम्हारे साथ हैं.
जुबेर एहमद खान
सहाफी