अज़ीज़
नाज़रीन,
आप लोगों को बीजेपी की सयासत से अच्छे से वक़फ़ियत होगी, बीजेपी जो कभी भी साफ़ और शफ़्फ़ाफ़ तरीक़े कार हिकमत इख़्तेयार कर के सियासत में इक़्तेदार हासिल करने से क़ासिर रही है, तो वो ऐसी सियासत को तव्वलुद कर रही है जिसमे इंसानी लाशों की अक्सरियत है. ख़्वाह वो फ़ौजिओं की लाशें हों या अवाम की लाशें उससे बीजेपी और संघ परिवार को कुछ फ़र्क़ नहीं है बस हमें तो इक़्तेदार की कुर्सी पे फ़ाइज़ होना है.
इंसानी लाशों के बाद दूसरी सबसे बड़ी अज़ीयत और तबाह कुन सियासत की शुरूआत बीजेपी ने की है वो है सहाफत की आवाज़ को फ़ासी देने की कवायत. हर उस इंसान की आवाज़ को दबा दिया जाता है जो ऐसे पैचीदा मामलों को अवाम के रूबरू पेश करता है, जिसमे हुकूमत, बीजेपी और संघ परिवार या हिन्दू दहशतगर्दी का पर्दा फाश करता है.
इस फ़ासी में शामिल हैं उस सहाफी की फेसबुक ब्लॉक करना, उसके आर्टिकल्स ब्लॉक करना, उसके खबरनामे को ब्लैक आउट करना, उसकी यू टयूब ब्लॉक करना, उसकी ट्वीटर हैंडल को ससपेंड या ब्लॉक करना जैसे अमल सरे फेहरिस्त हैं. ऐसा करने के पीछे दलील ये दी जाती है की वतन के खिलाफ उठने वाली हर आवाज़ को दबा दिया जाएगा, वतन के टुकड़े करने की बात करने वालों का ख़ैर मक़दम नहीं किया जाएगा. भारत के खिलाफ ग़लीज़ तास्सुरात देनें वालों के ऊपर हुकूमत सख्त हिकमत इख़्तियार करेगी, ऐसे लोगों की तमाम आई.डी. ब्लॉक कर दी जायेगी जो भारत की ग़लीज़ शोहरत करते हैं. ठीक है सही और दुरुस्त है आपका अमल क़ाबिले फख्र और क़ाबिले मुस्सरत है. लेकिन क्या हुकूमत ये बताने की ज़ेहमत करेगी की अगर क़ानून साज़ बदअमनी की बातें करतें हैं, क़त्ल व ग़ारत करने की बातें करतें हैं तो कैसी ज़ुबान में लिखना चाहिए जो बीजेपी वालों को भारत के खिलाफ दुष्टप्रकार नज़र ना आये. अगर अदलिया के फैसले तबाह कुन साबित होतें हैं मुत्तासिब ज़ाहिर होतें हैं एक ख़ास फ़रीक़ के लिए दुशवार कुन साबित होते हैं, साफ़ ज़ाहिर होता है की मुत्तासिब ज़ेहनियत से फैसला दिया हुआ है, तो कौन सी ज़ुबान में खिताब करना चाहिए जिससे इन बीजेपी और इक़्तेदार की कुर्सी पे फ़ाइज़ लोगों को ऐसा ना लगे की भारत की अस्मिता को चोट हुई है और भारत की साख आलमी बरादरी में धूमिल हो रही है. फिर ये बीजेपी वाले ही कोई नई ज़ुबान का ईजाद कर दें जिससे ना इंसाफ़ी भी हो कानून साज़ जुर्म में मुलव्विस भी पाए जाएँ और सहाफियों के खिताब से भारत की आन बान और शान के ऊपर कोई आंच भी ना आये.
जब मुल्क़ में रहने वाले किसी ख़ास फ़िरक़े के लोगों की ज़िन्दगी हवा से ज़्यादा सस्ती और खून पानी के मानिंद बहाना शुरू कर दिया जाएगा तो लाज़मी है तक़सीम और बटवारे के नक़्क़ारे फ़िज़ाओं में बुलंद होंगें. उसमे इतना बावेला मचाने की कोई ज़रुरत ही नहीं है. आज मोदी इन्तेज़ामियाँ मुस्लिम खवातीनों की हमदर्द बनती है, क्या वजह है की २ महीने पहले दूल्हा बने एक मुस्लिम शख्स को पीट पीट के हलाक़ कर दिया जाता है लेकिन उसकी ज़ौजा के बारे में अभी तक मन की बात से मोदी ने अवाम को खिताब नहीं किया. तलाक़ शुदा मुस्लिम महिलाओं की मोदी को फ़िक्र है लेकिन जो ऐसी मस्तूरात हैं जिनके शौहरों को शहीद कर दिया उनकी सुध कौन लेगा. तबरेज़ की बीवी २ महीने पहले निकाह हुआ उसने अपने शौहर के साथ हज़ारों खवाब देखे होंगे ज़िन्दगी जीने की ख्वाहिश होगी लेकिन अब उसका क्या होगा, उसके आगे पीछे कोई भी नहीं है. उसके वाल्देन पहले ही फौत हो चुके हैं. ऐसी एक नहीं हज़ारो मुस्लिम ख़वातीन हैं. गुजरात का मोहमद अय्यूब २४ साला ड्राइवर जिसको गौ कुशी के इलज़ाम में २०१७ में पीट पीट के शहीद कर दिया था. उसकी २० साल की ज़ौजा और २ मासूम बच्चे उनको कौन पालेगा. उसके ऊपर अगर कोई सहाफी सख़्त मज़्ज़मती ख़िताब करता है तो आप ग़द्दारी का तमग़ा देते हो उसका सोशल मिडिया से बाय कोट करते हो उसकी तमाम प्रोफाइल ब्लॉक करते हो.
सियासत के इंसानी लाशों के इस कारवां में अब दिल्ली का नाम भी जुड़ गया है. दिल्ली का दंगा सौ फीसद इमदादी है. मई २०१९ में मनोज तिवारी और बीजेपी के एक और कानून साज़ ने कलेक्टर को चिट्टी लिखी थी और दिल्ली में बढ़ती हुई तामीर कर्दा मस्जिदों पे तशवीश ज़ाहिर की थी और मालूमात निकाली थी के क्या ये मस्जिदें कानूनन बन रही हैं या ग़ैर क़ानूनी तरीक़ेकार हिकमत इख्तियार कर के तामीर की जा रही हैं. अब सवाल ये ही है के अभी तक ये मोहतरम तिवारी किस ग़फलत की नींद सो रहे थे. २०१७ में हरयाणा और उत्तर प्रदेश इन्तेज़ामियाँ ने ग़ैर क़ानूनी मस्जिदें सील की लेकिन ये मोहतरम तिवारी कुंभकर्ण की नींद सोते रहे. फिर अचानक जाग उठे क्योंकि ६ - ७ महीनों में दिल्ली में इंतेखाबात होने वाले हैं. फिर जान बूझ कर मंदिर के पास पार्किंग की जगह पे शराबी लोगों को बिठाया और उस इंसान को पार्किंग नहीं करने दी जिससे दंगा भड़क गया. फिर पत्थर बाज़ी में मंदिर के दरवाज़ों को इज़ा पहुंची. बस इस बात को तिल से पहाड़ बना के हालात मज़ीद तशवीशनाक ज़ाहिर कर दिए गए, और वोट हो गए एक जानिब. उसमे कूद गई वी ही पि अब इन्तेख़ाबी मरहले में इन सब बातों का खूब बखान किया जायेगा की दिल्ली में मस्जिदे खूब बन रही है और जो मौजूदा मंदिर है उनको भी तोडा जा रहा है. हिन्दू ख़ाइफ़ है, और वोट बैंक की वजह से केजरीवाल कुछ हिकमत इख़्तियार करने से क़ासिर हैं. जबकि ऐसा नहीं है, दंगा सियासी था उसको मज़ीद पैचीदा जान बूझ कर बनाया गया क्योंकि उस दंगे की जलती हुई आतिश में बीजेपी अपना सियासी नफा देख रही थी. बे शक अगर मस्जिदें ग़ैर क़ानूनी तरीक़ेकार हिकमत इख़्तियार कर के तामीर की गई है तो एक्शन होना चाहिए लेकिन ये सब करने का वक़्त बिलकुल दुरुस्त और मौज़ूं नहीं है.
ये अमूमन देखा गया है इंतेखाब से क़ब्ल इस तरह के दंगे खूब होते हैं, क्योंकि अभी इलेक्शन का दौर आ रहा है, दिल्ली है, महाराष्ट्र फिर बिहार, बाई इलेक्शन तो ऐसा होना लाज़मी है. अभी तक ये ही होता आया है बीजेपी ने सिर्फ लाशों में इक़्तेदार हासिल किया है. १९९२ की तारीख़ मौजूद है आडवाणी ने जो दंगे भड़का के लाशों पे सत्ता हासिल की थी. वो सिलसिला गुजरात, मुज़्ज़फ़्फ़पुर, वेस्ट बंगाल, केरला, बिहार सभी जगह एक जैसी स्टोरी है. पहले खुद ही ऐसा काम करेंगे जिससे दंगा भड़के और मंदिर खुद तोड़ देंगे, फिर सेक्युलर हुकरान जमात के ऊपर सख्त तनक़ीद के वो मुस्लिम समाज को बचा रही है और हिन्दू मेहफ़ूज़ नहीं हैं. उसका तस्सव्वुर ख़राब करेगें, इंसानी लाशों पे राजनीति करना तो बीजेपी का काम है. अब वो इंसानी लाशे फ़ौजिओं की हों या आम इंसान की. कश्मीर से ले कर श्रीलंका तक हर जगह खून बहाया है इन बीजेपी वालों ने सिर्फ और सिर्फ सत्ता पे बने रहने के लिए और अपने नुमाइंदो की संसद में बढ़त दिलवाने के लिए.
गुजरात के दो आई.पी.अस. एक संजीव भट्ट और दूसरा वंज़ारा. संजीव ग़ैर मुत्तसिब और खुले किरदार के अफसर जो अपने फ़र्ज़ के आगे किसी भी तरह का समझौता नहीं करते थे, दूसरा वंज़ारा जो दहशतगर्द ज़ेहनियत, क़ातिल और इंसानी खून रेज़ी करने वाला दरिंदा सिफ़त. लेकिन क्या हुआ सिर्फ वाहिद १९९० की कस्टोडियल हलाक़त जिसको वापिस खोला गया २०१५ में और संजीव को उम्र क़ैद २०१९ में दी गई. जबकि वंज़ारा जैसे शैतान और क़ातिल जो २००२ से ले कर २००५ के दरमियान १२ इंसानों का कोल्ड ब्लड मर्डर करता है उसको बाइज़्ज़त बरी किया जाता है. वजह सिर्फ एक है भट्ट साहब ने मोदी की हुकुम अदुली की और २००२ के दंगों में अपने फ़र्ज़ को बा खूबी अंजाम दिया और अदलिया में मोदी के खिलाफ हलफबरदार हुए. जबकि वंजारा मोदी के जैसा साबित हुआ मुत्तसिब, खुनी, दरिंदा सिफ़त तो उसको तमाम जुर्म से बाइज़्ज़त बरी किया गया.
अब अगर मोदी इंतेज़ामिया के ऊपर कोई सहाफी सख़्त तनक़ीद करता है और उसमे अगर भारत की आन बान शान को ठेस लगती है तो गलती किस फ़रीक़ की है.
आपका अपना
ज़ुबेर अहमद खान