Sunday, 9 June 2019

फतवे की हक़ीक़त: पैगम्बर या शैतान


मुसलमानों के अहम् तेहवारों में से एक ईद है जो की एक महीने के रोज़ेदारों को अल्लाह तबारक ताला की जानिब से इनाम है जो खुशी का एहसास देती है.  इस दिन दो बातें मन्ज़रे आम हुई, एक देवबंद का मशकूक किरदार जिसमे उसके जिस्म से मुनाफ़िक़त की बदबू आ रही है और दूसरा पाकिस्तानी बेगम का भोपाल के देवबंदी शहरकाजी (शायद मोदी गुलाम) से मिलना.   सहाफी को पाकिस्तानी बेगम के देवबंदी शहरकाजी से मिनले पे कोई एतेराज़ नहीं है अगर वो एक सरकारी मुजाकेरात होती.  उसका एतेराज़ तो साध्वी का देवबंदी शहर क़ाज़ी के घर की मस्तुरात और दीगर हज़रात से मिलने पे है.  बच्ची के साथ फोटो खिचवाने पे है.  मिठाई का पैकेट ले कर जाने पे है.  गोया वो मुलाक़ात सरकारी नहीं बल्कि सहाफी को ज़ाती और रिश्तेदारों वाली महसूस हुई.   और जो उसका शक था वो दुरुस्त और सही साबित हुआ. मुलाक़ात के चंद लम्हे भी नहीं गुज़रे थे की देवबंद से ग़ैर शराई और ख़िलाफ़े सुन्नत फ़तवा हाज़िर हो जाता है.  ईद के रोज़ गले लगना नाजाइज़ और गुनाह है.  अब ऐसे फतवों पे ये सहाफी कहाँ चुप रहता उसने फ़ौरन ट्वीट किया.

Zuber Ahmed Khan
साध्वी का भोपाल के देवबंदी शहर क़ाज़ी और उसके परिवार वालों को मिलना कारगर साबित हुआ. देवबंद का आया गैर शराई, सुन्नत के खिलाफ फ़तवा क़रार दिया ईद को गले मिलना ना जाइज़ और गुनाह. ऐसे ऊल जलूल फतवे पे सहाफी जुबेर की सख्त तनक़ीद. फतवे को बताया मोदी को पैगम्बर का रुतबा देने की मोहीम. रसूले अरबी मोहम्मदे मुस्तुफा की हदीस है जब दो मुसलमान सिर्फ मुसाफा करते है तो अल्लाह और उसके फरिश्तों की रेहमत उन दोनों पे बरसती है. तथा दोनों मुसलमानों के दरमियान इख्तेलाफ़ात, नाइत्तेफ़ाक़ी दूर होती है और मोहब्बत बढ़ती है. जब मुसाफा करने का इतना बड़ा अजर है तो गले मिलने का क्या अजर होगा. लेकिन हो सकता है मोदी जी के बहकावे में आ के मोदी गुलाम देवबंद ने ऐसा ऊल जलूल फ़तवा दिया होगा. ना मुसलमान गले मिलेंगे और ना ही उनके इख्तेलाफ़ात दूर होंगे. अब तो बस समूचे देवबंद को मोदी जी को पैगम्बर का रुतबा दे देना चाहिए. और गुलाम मिर्ज़ा कादयानी की तरह मोदी जी को आखिर सर्व धर्म पैगम्बर ना सिर्फ तस्लीम कर लेना चाहिए बल्कि ऐसा फ़तवा भी देना चाहिए. फिर मोदी जी के मक़सद झूठा सबका साथ और सबका विकास और सबका विशवास के हामी हो कर मुस्लिम समाज के खिलाफ ज़हर उगलना चाहिए और उनका क़त्ले आम करवाना चाहिए तथा मज़हब में फूट डाल कर मुसलमानों को तक़सीम कर देना चाहिए. अगर मोदी जी सबका विकास और विशवास चाहते हैं तो सबसे पहले आर्मी में ३५ साल से ज़्यादा अपनी सेवा देने वाले कारगिल युद्ध में भारीतय फौज के साथ एक इस्लामिक मुल्क़ के खिलाफ जंग लड़ने वाले राष्ट्रपति से सम्मानित आर्मी ऑफिसर को उसकी सेवा निर्वत्ति के बाद तोहफे में जेल भेजने के बजाये और घुसपैठिये विदेशी का तमगा देने के बजाये उनको भारीतय तस्लीम करें. अगर ऐसा नहीं है तो उस के बाद भी इन मुनाफ़िक़ों के दिलों दिमाग में कुछ असर नहीं होगा. सहाफी जुबेर.

सहाफी का शक एक दम सही और दुरुस्त निकला.  ये तमाम पेशबंदी मोदी को पैगम्बर के ओहदे पे फ़ाइज़ करने के लिए ही थी. खबर है, काशी विद्वत परिषद ने गुजिश्ता हफ्ते वज़ीरे आज़म नरेंद्र मोदी को कौमी संत (राष्ट्र ऋषि या राष्ट्रीय संत) के ओहदे से फ़ैज़याब करने का एलान किया था.  परिषद की जानिब से इसके लिए हगामी इजलास मुन्नाक़िद कर एक क़रारदार  की पेशकश ज़ब्र के साथ मंज़ूर करवा ली गई थी.  लेकिन अब इसे लेकर परिषद दो गुट में बंट गया है. एक गुट ने इसे सियासत से मुत्तासिर बताते हुए इस इज़्ज़त अफ़ज़ाई की मुख़ालेफ़त कर रहा है.  वज़ीरे आज़म मोदी को मिलने वाला यह ओहदा अब मुतनाज़ा हो गया है.  पीएम के ओहदे पर परिषद के ही महासचिव शिवजी उपाध्याय ने नियमों का अनुपालन ना किए जाने का हवाला देते हुए इस पर सवाल उठाए है.

विद्वत परिषद के मोत्तामद (सचिव) ने कहा कि हगामी इजलास की जानकारी नायब सदर समेत पंचायत के तमाम मेमरान को फोन से दी गई थी. वह इजलास में मौजूद ना हो सके थे. काशी विद्वत पंचायत के मोत्तामद (सचिव) ने कहा कि १५ जून को कार्यकारिणी का इजलास बुलाया गया था.  अगर किसी मुद्दे को लेकर किसी भी मेंबर या पदाधिकारी के दिलों दिमाग में किसी किस्म का शक व शुबा है तो उसको दूर किया जाएगा.

काशी विद्वत तंज़ीम के महासचिव शिवजी उपाध्याय ने फैसले को सियासत से मुत्तासिर बताते हुए कहा कि हुकुमरान जमात से मुत्तासिर हज़रात को बुला के कुछ लोगों ने गैर सियासी मेमरान से मशोरा किए बगैर ही उपाधि देने का एलान कर दिया है.  इसके लिए तो ज़रूरी  हिकमते अमली अपनाई गई और तंज़ीम के इजलास में पेशकश को मंज़ूर कर लिया गया.  ऋषि द्विवेदी समेत तंज़ीम के  कार्यकारिणी के कई मेमरान ने भी उपाध्याय की हिमायत करते हुए कहा कि इस तवज्जो की पेशकश कब और किस मीटिंग में मंज़ूर की गई, इसका इल्म हमें नहीं है. दावे के मुताबिक अगर हगामी इजलास में ही इसके लिए प्रस्ताव पारित किया गया, तो भी इजलास  की इत्तेला तो सभी मेमरान को दी ही जानी चाहिए थी.  तंज़ीम की जानिब से इससे क़ब्ल वज़ीरे अज़ाम मोदी और वज़ीरे आला योगी आदित्यनाथ को उन्वान देने के लिए लॉबिंग के इल्ज़ामात भी लगे हैं.

मोदी जी नए नारे  "सबका साथ, सबका विकास, सबका विशवास" के साथ हुकूमते हिन्द के वज़ीरे आज़म की कुर्सी पे फ़ाइज़ हुए हैं. लेकिन उमूमन ये देखने में आता है मोदी जी का हर काम शैतानों की तरह झूट, फरेब, धोखा, गद्दारी, कपट से किया किया हुआ होता है.  या बैक डोर में वो ज़्यादा यकीन रखतें हैं.  तभी उनकी सोच सदा ही पीछे की रहती है और आगे वाली को घर के बहार का रास्ता दिखातें हैं.  जिसका सबसे बड़ा सबूत है सुप्रीम अदलिया का हम जींस परस्ती को क़ानूनी जामा पहनना. 

फिर जिस तरह से आसाम में ४५ लाख अवाम जिसमे सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम हैं को घुसपैठिया साबित कर के उनका आवामी हुक़ूक़ छीन लिए गए.  वही हालात अब तमाम हिन्द में देखने को मिलेगें.  और कमो बेश निस्फ़ या उससे ज़्यादा मुस्लिम आबादी ग़ैर मुल्क या घुस्पेठिये ज़ाहिर कर दिए जायेगे और उनसे उनके अवामी हुकूक छीन लिए जायेगे. 

मुस्लिम अवाम में सख्त तशवीश और फ़िक्र मंदी है और ऐसे पैगाम व्हाट्सप्प में मन्ज़रे आम हो रहे हैं की आप सभी को इत्तेला दी जाती है की अपना

. आधार कार्ड
. पेन कार्ड
. पासपोर्ट
. वोटिंग कार्ड
. राशन कार्ड
. इलेक्ट्रिसिटी बिल (एड्रेस प्रूफ के लिए)
. टेलीफोन बिल
. तुलबा अपना स्कूल लिविंग सर्टिफिकट
.  डिग्री सर्टिफिकट

एहतेमाम के साथ रखे किसी भी वक़्त इनकी ज़रुरत पड़ सकती है इन दस्तावेज़ की बुनयाद पे आप ग़ैर हिन्द या घुस्पेठिये होने से बच सकते हैं.

 उन सभी पैग़ाम भेजने वालों को इंग्लिश और हिन्दू दोनों ही ज़ुबान में ये सहाफी जवाब पहले ही दे चूका है.  अलबत्ता फिर से कह रहा है.  इन दस्तावेज़ों की कोई एहमियत नहीं है.  अगर बीजेपी और हिन्दू दहशतगर्दों ने आप को गुस्पेठिया ज़ाहिर करना है तो आपकी कोई भी हिकमत, दस्तावेज़ और ततबीर काम नहीं करने वाली.  जब भारतीय फौज में ३५ साल से ज़ाइद अपने फ़र्ज़ को अंजाम देने वाले, कारगिल की जंग में एक इस्लामिक मुल्क़ से काफिर फ़ौजिओं का साथ देने वाले, सदरे जमुहरिया के हाथ मैडल लेने वाले अफसर की पोस्ट से किनाराकश होने वाले सनाउल्लाह को ग़ैर मुल्क और गुस्पेठिया क़रार दे कर के जेल में डाल दिया तो एक आम मुसलमान की हैसियत ही किया है.   मज़े की बात तो ये की ये सनाउल्लाह आज भारत में ज़ाहिर नहीं हुए बल्कि उनके आबो अजदाद अंग्रेज़ों के पहले से हिंदुस्तान में रहते आये थे.

असल मुद्दा हिन्दू दहशतगर्दों और बीजेपी का बढ़ती हुई मुस्लिम अक्सरियत से ख़ौफ़ज़दा होना है गुस्पेठियों का तो एक बहाना है.  और ये सारी पेशबंदी उसी के लिए की जा रही है.  ताके आधे से ज़्यादा मुस्लिम अवाम को बाहरी मुल्क या घुस्पेठिया ज़ाहिर कर दिया जाए फिर जब उनके पास अवाम के हुकूक ही नहीं होंगे तो किस आधार पे अपना हक़ मांगेगे.  तो बस अब मुसलमानों को भी एक जुट हो कर बटवारे की जानिब गामज़न होना चाहिए.  वैसे भी तुमको भारत के बाशिंदे होते हुए भी तमाम हक़ फ़राहम नहीं है तो अगर गुस्पेठिये साबित कर दिए जाते हो तो और मज़ीद ज़ुल्म और सितम का शिकार होंगे. 

फिर उसपे झूठा नारा  सबका..... और सबका विशवास”  शान और ओहदा चाहिए इस शैतान को पैगम्बर वाला वो भी झूट, फरेब, कपट, छल के साथ हक़ और इन्साफ से नहीं.  अब मर्ज़ी है आपकी आपको क्या चाहिए एक ऐसे समाज के साथ रहना जिसका हाकिम असल में शैतानी फितरत और अमलियात का माहिर है जहाँ आपकी जदीद हक़तल्फ़ी होगी या अपने हक़ का हिस्सा. 

अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...