पुलवामा हादसे के बाद जिस तेज़ी से हालात पेचीदा हुए उससे भारत खाना जंगी के मोहने पे आ कर खड़ा हो गया है. ऐसे ही हालात तब पैदा हुए थे जब बीजेपी के रकूने पार्लिमानी और दिगर कारकून मुस्लिम अवाम को धमकाते थे की या तो मुसलमान पाकिस्तान चले जाएँ या हिन्दू मज़हब इख्तियार कर के हिन्दू रीती रिवाज के हिसाब से रहे. ऐसी ही दहशतगर्दाना ज़ेहनियत २०१४ के बाद से मुस्लिम अवाम को मुतवातिर खौफ और डर के माहौल में ज़िंदा रहने में मजबूर कर रही थी. हमेशा पाकिस्तान के साथ जंग के ऊपर मुसलमानो को हिन्दू मज़हब इख्तियार करने का खौफ दिखाना. फिर इस मुद्दे पे पहले ही ये सहाफी दो तीन मज़मून से तमाम मुसलमानों को खिताब कर चूका है. मुसलमानों तुमको वैसे भी मरना है और अगर ज़िंदा रहे तो भारत में तुमको हिन्दू मज़हब इख्तियार करने को मजबूर कर दिया जाएगा, बेहतर है अगर जंग जैसे हालात बनते है तो तुम पाकिस्तान के हक़ में दुआ करो.
अब जब हालात मज़ीद पेचीदा होते चले जा रहे हैं तब मोदी इंतेज़ामिया और खुद मोदी को कश्मीर याद आ रहा है. एक जलसे से खिताब करते हुए मोदी जी कहते हैं हमारी लड़ाई कश्मीर के लिए है ना की कश्मिरिओं से है. ये सहाफी मोदी जी से कहना चाहता है. मोदी जी कश्मीरी अवाम की बर्बादी के लिये आप ओर सिर्फ आप ज़िम्मेदार हो जब ज़ुल्म हद से ज़्यादा बड जाता है तो इन्तेक़ाम लेने का ना सिर्फ जज़्बा पैदा होता है ब्लकि इंक़लाब ज़िंदाबाद के नारे भी फ़िज़ाओं में बुलंद होते हैं. आज भारतीय फ़ौज की हिमायत में संघी शायरों से लेकर तो लंगूर सभी खड़े हैं. अगर कश्मीरी अवाम की हक़तल्फ़ी के खिलाफ लंगूरों की जमात खड़ी रहती और बजाये उनको पत्थर बाज़ बोल के बदनाम करने के हकीकत बयानी की जाती, के किस तरह बे गुनाह कश्मीरी अवाम को फौज मौत के घाट उतारती है. किस तरह फौज अवाम पे ज़ुल्म और तशद्दुत करती है. मासूम कश्मीरी बच्चिओं और मस्तुरात की अस्मतदरी करती है. तो हालात कुछ और होते.
मेजर गोगोई शायद आप भूल गए होंगे मोदी जी पर हम नहीं भूले. उस ना मुराद ने एक ऐसे कश्मीरी नौजवान को अपने और अपने साथिओं के तहफ़्फ़ुज़ के लिए अपनी जीप से बाँधा था जो सिर्फ और सिर्फ हिन्दुस्तान के जमुहरियत और राये शुमारी के अमल पे कामिल यकीन रखता था. जिसका निस्फ़ खानदान या तो हुकूमत के इदारों में काम पे है या फौज में हैं. एक नहीं फौज के ऐसे हज़ारों हमले मासूम कश्मिरिओं पे ही होते है. जिसके ऊपर इस सहाफी ने कई मज़मून वीडियो के साथ शाये किये हैं. किस तरह से नमाज़ पे जाते हुए एक रोज़ेदार को बंदूकों से लेस आर्मी जवानो ने पकड़ लिया और लातों घूसों और डंडों से मारा गया जब उसने कहा में रोज़े से हूँ मुझे काहे को मार रहे हो तो फौज का जवान कहता है काहे को रखा रोज़ा हम से पुछा था बोल कल से रखेगा रोज़ा. फिर अपने जूतों के पास उससे नाक रगड़वाई और उस फौजी ने अपने आपको उस युवक से सजदा करवाया.
आपकी फौज के ज़ुल्म और सितम ने कश्मीरी अवाम को इतना मजबूर कर दिया की उन बेबस और मजबूर नौजवानों ने अपने दिफ़ा के लिए हथियार उठा लिए. और जब कश्मीर का अवाम हर रोज़ के ज़ुल्म, टॉर्चर अपनी बेहेन बेटिओं की अस्मत के बचाव के लिए हथियार उठाता है तो आप उनको दहशतगर्द बोलते हो. क्या उनके सामने और कोई रास्ता था, बात चीत तो आप करना नहीं चाहते थे ना ही हुर्रियत से और ना ही पकिस्तान से. तब रोज़ रोज़ के मरने के बजाये अपनी ज़िंदेगी ही दाव पे लगा दी उन लोगो ने. आपकी दोगली हिकमते अमली ओर अपने अना को कायम रखने की हिटलर ज़ेहनियत आज के कश्मीर के बर्बादी के ज़िम्मेदार है. नही तो हालत इतने पेचीदा कभी नही थे. कांग्रेस के वक़्त भी कश्मीरी अवाम को भारतीय फ़ौज के ज़ुल्म, तशद्दुत और दहशत को देखने का एहसास होता था लेकिन आपने तो हद कर दी. और अब घड़याली आंसू बहा रहे हो.
नए दौर के आज के भारत में आपके ज़ुल्म से ना सिर्फ कश्मीरी अवाम बल्कि मुस्लिम अवाम भी ज़बरदस्त तरीके से मुत्तासिर हुआ है. हर संघी और आदमखोर अवाम को आंसू की एक एक बूंद का जवाब देना होगा. १९९२ से ले कर २०१६ तक कभी भी इस सहाफी ने आज़ादी की मांग नहीं की लेकिन जब हर दुसरे रोज़ गौ आतंकी किसी ना किसी मुस्लिम को मार डालते थे फिर भी आपकी हुकूमत खामोश रही और आज झूठी मोहब्बत दिखाने चले आये हम सब एक है. अब इन संघी समाज को और हुकूमते हिन्द को भी मुस्लिम समाज की ज़रुरत पड़ने लगी . तब इनका प्रेम कहाँ चला गया था जब गो आतंकिओं की गुल पोशी की गई थी. तब इनकी मोहब्बत कहाँ चली गई थी जब मुस्लिम समाज की माशियत को तबाह करने और साजिशन कानून सदनों में बनाये गए थे. तब आपकी मोहब्बत कहाँ चली गई थी जब मुसलमानों को बर्बाद करने के कानून बीजेपी और संघी संसद, विधान सभाओं और म्युनिसिपल्टी में बना रहे थे. तब इनकी मोहब्बत कहाँ चली गई थी जब गैर ज़रूरी वजह से नेशनल सेफ्टी एक्ट में सिर्फ और सिर्फ मुसलमानों को गिरफ्तार किया गया था. उत्तर प्रदेश में १६३ और हाल ही में अलीगढ़ तनाज़या के बाद विद्यापीढ़ के दहशतगर्दों को छोड़ दिया और नेशनल सेफ्टी एक्ट में ओवेसी मुवाफिक तुलबाओं पे कारवाही की. क्या ये ज़ुल्म नहीं है और अब हमारा साथ मांग रहे हो. अगर जंग होती है तो इस सहाफी की तमाम दुआएं पकिस्तान के लिए होंगी. खुली बात है. ज़ालिम को मुसलमानों पे किये हुए अपने हर ज़ुल्म का हिसाब देना होगा. आपके ज़ुल्म से हुए मुसलमानों के यतीम बच्चों, उनकी बेवाओं और वाल्दैन के हर आंसू का हिसाब, हर खून की एक एक बूंद का हिसाब.
आज मुसलमानों को शायरों की महफ़िल में बुला के उसन से शफक़त और मोहब्बत दिखाई जा रही है. हम सब एक हैं, शेर बोले जा रहे हैं हिन्दू मुस्लिम ज़िंदाबाद, दहशर्तगर्दी मुर्दाबाद. लेकिन क्या किसी शायर ने ऐसी ही अशआर और अलफ़ाज़ मुस्लिम अवाम की हलाक़त के वक़्त बोले थे. इतना ही नहीं जब नसीर और आमिर जैसे अवामी शख्सियत ने मुस्लिम समाज और इंसानियत के दुश्मनों के खिलाफ आवाज़ बुलंद की तो उसको इन्ही इन्तहा पसंदों ने पूरी शिद्दत से खामोश कर डाला, आज जो लंगूर मुस्लिम अवाम को साथ लेने की बात कर रहे हैं उन्ही लंगूरों ने ऐसी अवामी शक्सियात के बयानात पे सख्त अलफ़ाज़ में मज़मत और तनक़ीद की थी. आज उन सभी लोगो को मुसलमान अज़ीज़ और प्यारे हो गए. दिसम्बर २०१८ के आखिर तक मुस्लिम अवाम की पीट पीट हलाकत हुई है और उसपे जो संघी मकतूल और उसके मज़हब के ऊपर तनक़ीद करते थे आज वही संघियों को मुसलमान प्यारे दिखने लगे.
आज मुसलमानों को शायरों की महफ़िल में बुला के उसन से शफक़त और मोहब्बत दिखाई जा रही है. हम सब एक हैं, शेर बोले जा रहे हैं हिन्दू मुस्लिम ज़िंदाबाद, दहशर्तगर्दी मुर्दाबाद. लेकिन क्या किसी शायर ने ऐसी ही अशआर और अलफ़ाज़ मुस्लिम अवाम की हलाक़त के वक़्त बोले थे. इतना ही नहीं जब नसीर और आमिर जैसे अवामी शख्सियत ने मुस्लिम समाज और इंसानियत के दुश्मनों के खिलाफ आवाज़ बुलंद की तो उसको इन्ही इन्तहा पसंदों ने पूरी शिद्दत से खामोश कर डाला, आज जो लंगूर मुस्लिम अवाम को साथ लेने की बात कर रहे हैं उन्ही लंगूरों ने ऐसी अवामी शक्सियात के बयानात पे सख्त अलफ़ाज़ में मज़मत और तनक़ीद की थी. आज उन सभी लोगो को मुसलमान अज़ीज़ और प्यारे हो गए. दिसम्बर २०१८ के आखिर तक मुस्लिम अवाम की पीट पीट हलाकत हुई है और उसपे जो संघी मकतूल और उसके मज़हब के ऊपर तनक़ीद करते थे आज वही संघियों को मुसलमान प्यारे दिखने लगे.
अगर भारत खाना जंगी की तरफ जाता है तो चला जाए लेकिन मुस्लिम अवाम को ज़ालिम का साथ हरगिज़ नहीं देना चाहिए. मोदी को वज़ीरे अज़ाम संघी और तशद्दुत पसंद हिन्दू ज़ेहनियत ने बनाया ही मुस्लिम नस्ल कुशी करने के लिए था. वतन की मोहब्बत में अंधे हो कर ज़ालिम के ज़ुल्म का हामी हरगिज़ ना बने.