चुनाव आते है बाबरी मस्जिद का मसला संघ, बीजेपी और हिन्दू कट्टरपंथिओं
के ज़ुबान की ज़ीनत बन जाता है. और रामचंद्र
जिनको कट्टरपंथिओं, संघी, बीजपी तथा समूचे हिन्दू समाज के दिलों में होना चाहिए वो
रामचंद्र रोड, मीडिया के लंगूर वा लँगूरनिओं और राजनीति के अखाड़े के हीरो और उस अखाड़े
की ज़ीनत बन जाते है, और उस अखाड़े की रौनक बढ़ाने लगते है.
मीडिया के लंगूर और लँगूरनियाँ असद साहब और दानिशमंदो से कुर्बानी देने
की उम्मीद रखते है. सवाल ये उठता है हर मसले
पे मुस्लिम ही कुर्बानी क्यों दें. बाबरी मस्जिद
मसले पे जब न्यायलय में मुस्लिम समाज का पक्ष मज़बूत होता जा रहा है तो लंगूर और लँगूरनियाँ,
जर खरीद रिज़वी जैसे दलाल मुसलमानों में इन्तेशार पैदा करना चाहते है और सभी लंगूर,
संघी दलाल; मुस्लिम कुर्बानी मांग रहे है. लंगूर और लँगूरनियाँ कहते नहीं थकते
१.
क्या मुस्लिम बड़ा दिल नहीं कर
सकते.
२.
क्या वो अपना हक़ नहीं छोड़ सकते…
३.
क्या हिन्दू समाज को मंदिर की
ज़मीन नहीं दे सकते.
हर जगह जब वतन को लहू की ज़रुरत पड़े तो काहे को मुस्लिम ही याद आते है. फिर इतना ही नहीं इतिहास के पन्नो में आप उनको किस
नाम से जानते हो ये बड़ी बात है. आक्रांता,
ज़ालिम, लूटेरे मंदिर तोड़ के ताज बनाया, मंदिर तोड़ के जामी मस्जिद बाँधी. आज अगर मुस्लिम समाज ने कुर्बानी दे भी दी तो इस
बात की क्या ग्यारंटी है की १००० साल बाद जाते उनके वंशजो को जो गाली आज दी जा रही
है वही गाली नहीं दी जायेगी. आज मुगलों और
मुस्लिम बादशाहों की किस कुर्बानी को आज याद किया जाता है, जो आज दी हुई मुस्लिमों
की कुर्बानी को इतिहास में याद किया जाएगा.
हिन्दू सदा ही एहसान फरामोश होता है, चापलूसी करना संघ की आदत है चापलूसी कर
के अपना उल्लू सीधा करो और जब काम निकल जाए तो उस बन्दे के एहसान को फरामोश कर दो. सिर्फ उन्ही को याद रखो जो संघ और बीजेपी के चाहते
है या राष्ट्रीय मुस्लिम मंच के नुमाइंदे है.
नहीं अब नहीं हरगिज़ नहीं मुस्लिम बाबरी भी लेंगे और अपना हक़ भी. इंशाअल्लाह.
आज मुस्लिम समाज की कुछ काली भेड़ें और संघ के एजेंट मुसलमानो को डरा
रही है अगर बाबरी मस्जिद का फैसला मुस्लिम हक़ में आया तो मुसलमानो का खून बहेगा, मुलसमानों
का क़त्ले आम होगा, दंगे होंगे. इसीलिए बाबरी मस्जिद की ज़मीन हिन्दुओं को दे दो और बड़े
दिल का मुज़ाहेरा करो. अगर तुमको ज़मीन मिल भी
गई तो तुम उसपे नमाज़ नहीं पड़ सकते. संघ के
एजेंट और उन तमाम ज़र खरीद मुसलमानो से इस सहाफी का ये कहना है.
१.
क्या मुस्लिम समाज का क़त्ले आम
अभी तक नहीं हुआ.
२.
क्या अभी तक मुस्लिम समाज बोहोत
ही सुकून से था.
३.
क्या उसका रोज़गार, नौकरी धंदा
अभी तक नहीं छीना गया.
४.
क्या उसकी बेहेन बेटिओं की अस्मत
सरे बाजार अभी तक नहीं लूटी गई.
५.
क्या मुस्लिम समाज के खिलाफ एक
तरफा दंगे अभी तक नहीं हुए.
६.
क्या मुसलमानो के खिलाफ नफरत और
ज़हर हिन्दू समाज के बच्चो में अभी तक बिलकुल भी नहीं भरा गया.
७.
क्या मुस्लिम समाज सरकारी आतंकवाद
का शिकार अभी तक बिलकुल भी नहीं हुआ.
८.
क्या ये संघ के मुस्लिम एजेंट
दावे के साथ केह सकते है की मुसलमानो की अभी तक हकतलफी बिलकुल भी नहीं हुई.
जब कुछ भी नहीं करते हुए वो सारी बाते मुस्लिम सामाज के साथ हो रही
है जिसका डर ये ज़र खरीद मुनाफ़िक़ और संघ के एजेंट दिखा रहे है तो क्यों ना जद्दो जेहद
की जाए. अगर हमको हमारा हक़ मिल जाता है और
वही सब होना है जो होता आया है तो नया क्या होगा.
इसमें नया ये होगा के हमको हमारा हक़ मिल चूका होगा.
दिवार फिल्म का डॉयलोग खूब याद आया, एक करोड़ पति डाकू, स्मगलर अपने
छोटे भाई को डर दिखता है और अपनी झूटी शान और रसूख का हवाला देता है. कहता है आज मेरे पास ये है वो है तुम्हारे पास क्या
है. छोटा भाई सच्चाई और ईमानदारी पे था उसके पास ज़्यादा कुछ नहीं था. छोटा बड़े से कह देता है मेरे पास माँ है..... वही
मिसाल फिट होती है संघी एजेंट मुस्लिम समाज को दंगो का और ना जाने किस किस बात का डर
दिखा रहे है. और चाहा रहे है की मुस्लिम उनके
दबाओ में आ के समझौता कर लें. मुस्लिमों का
भी उन सभी लोगो को जवाब है हमारे पास सुप्रीम कोर्ट है. जो भी फैसला वो करेगा हम उसपे भरोसा करेंगे. डाकू, फरेबी, तस्कर भाई को यकीन था की माँ उसकी
दौलत, रसूख, राजनैतिक शक्ति के दबाव में आ
के उसके हक़ में फैसला करेगी, लेकिन माँ ने ईमानदार, सच्चे और गरीब बेटे के साथ जाना
मुनासिब समझा जो हक़ पे था और छोटे बेटे के हक़ में फैसला किया.
Muslims stop sacrificing with immediate effect:
Journalist Zuber
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