Tuesday, 1 May 2018

आज़ादी का जश्न, आज़ाद सोच के साथ


सोच अभी भी वही रखना है जो लेखक ने गणतंत्र दिवस के ऊपर लिखे लेख गणतंत्र दिन बनाओ लेकिन दिखो उनसे अलग में बताई है.  लेखक की लड़ाई सरकार या किसी पक्ष के खिलाफ नहीं है बल्कि लेखक की लड़ाई सत्य और असत्य के खिलाफ है. लेखक सत्य के साथ खड़ा है और सत्ताधारी पाखंड, झूट, फरेब, दोगली नीति, पक्षपात आदि के साथ खड़े है, तो लेखक का ये कर्तव्य है के वो सत्य को आलोकित करे.  एक तरफ तो जनता के तमाम नुमाइंदे संसद में मासूमो के साथ रेप पे फ़ासी की सजा का समर्थन कर रहे है दूसरी तरफ कठुआ रेप के ऊपर बेजीपी के मंत्री तथा विधायक हिन्दू जाग्रति मंच के साथ बलत्कारिओ की रिहाई के समर्थन में रैली निकालते हैं. उतना ही नहीं ३० अप्रैल २०१८ को राज्य के उप मुख्यमंत्री शपत लेते ही बयान देते है कठुआ रेप मामूली घटना है उसको तूल नहीं देना चाहिए.

लेखक उस आतंकवादी और ज़हरीली मानसिकता और सोच के खिलाफ है. जिसका समर्थन भक्तगण करते फिरते है गोडसे एक मनुष्य मात्र नहीं था बल्कि एक विचारधारा है जो अभी तक भारतीयों में ज़िंदा है. तो ऐसे पाखंडिओं से लेखक कहना चाहता है बेशक गोडसे एक विचारधारा है लेकिन देशभक्ति वाली सोच नहीं गांधीवादी सोच नहीं बल्कि आतंकी विचारधारा खून खराबे की विचारधारा, विघटनकारी विचारधारा, साम्प्रदाइक विचारधारा, कट्टरवादी विचारधारा और ऐसी विचारधारा को कुचलना भारत के अमन पसंद नागरिको का कर्तव्य है और समाज के सामने नंगा करना लेखक का मकसद है.

तो ऐसे पाखण्डिओ, फ़रेबिओं, झूटों के साथ किसी भी तरह का राष्ट्रिय पर्व (आज़ादी, गड्तंत्र दिवस) में मंच सांझा नहीं करना चाहिए.

आज़ादी का जश्न मनाओ लेकिन दिखो उनसे अलग और अलग झंडा फेहराओ.  एक ही स्थान पे अगर दो तिरंगे झंडे फहराने पड़े तो कोई हर्ज नहीं. एक झंडा वो लोग फेहरायेगे जो पाखंडी, देश द्रोही, झूठे, फरेबी, आतंकवाद के हामी है और गोडसे के सिद्धांतों पे चल रहे है दूसरा वो लोग फेहराएँ जो असली देश भक्त है सच्चाई और गाँधीवादी सिंद्धान्तों के मार्ग पे चल रहे है.

लेखक का लेख सिर्फ उन भारतीयों के लिए है जो पाखंडी ना होते हुए स्वच्छ मन रखते है जिनके मन में कपट, दोगलापन, दोहरी नीति, पाखंडी भक्ति न हो परन्तु जो मन में हो वही ज़ुबान पे हो. ऐसे भक्तो के लिए लेखक का लेख नहीं है जो मू से तो राम राम रटते हों लेकिन बगल में छुरी रखते हों. ऐसे लोग सदा बलि देने के लिए मासूम बकरे की तलाश में लगे रहते है और बेल, सांड को बचा लेते है. नाम बड़े भाई का काम कसाई का. ऐसे कसाईओं से सावधान.  अगर बलि के लिए बकरे मिलना बंद हो गए तो वो आप में से किसी भारतीय की बलि देना शुरू कर देंगे.  

वैसे भी सरकार ने आज़ाद सोच, आज़ाद हवा, आज़ाद पानी सभी चीज़ों पे पाबन्दी और कैद लगा दी है. देश में इमर्जेन्सी से ज़्यादा ख़राब हालत हो गए है. जब देश की धरोहर किसी पाखड़ी उधोगपति को गिरवी रखी जा रही है तो आज़ाद सोच क्या हैसियत रखती है. भारत वर्ष को १५ अगस्त १९४७ को ब्रिटिश सरकार से आज़ादी मिली थी और २६ मई २०१४ को वापिस से भारत गुलाम हो गया.

English version


Celebrate independence, with independent thoughts. 
 


अब्दुल कुर्सी का हक़दार है.

हर कोंग्रेसी की सोच मिल्लत से ग़द्दारी वाली है. भलें आज मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के लिए बड़े क़सीदे लिखे जातें हैं. उन्होंने तंज़ीम का भला किया ल...